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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 21 अगस्त 2017

कहानी माधवी की – नारी की महत्ता या यौन शोषण - एक पौराणिक कथा----डा श्याम गुप्त...

                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 


कहानी माधवी की – नारी की महत्ता या यौन शोषण - एक पौराणिक कथा----
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                  बुराइयां मानव का एक स्वाभाविक भाव है वे समाज में सदैव से ही रही हैं, हाँ उन्हें छुपाने व जोर जबर्दस्ती से मिटाने के प्रयत्न की अपेक्षा पारदर्शी तौर पर उजागर किया जाता रहा जाय तो आचरण सुधार की सतत प्रक्रिया अधिकाधिक प्रभावी रहती है |
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                         भारतीय शास्त्र एवं तत्व चिंतन व व्यवहारिक दृष्टिकोण सदा ही पारदर्शी रहा है | उन्होंने अपने समाज में उपस्थित बुराइयों, कुप्रथाओं आदि को छुपाने की अपेक्षा सदैव उजागर व स्पष्ट किया है एवं वैदिक, पौराणिक व शास्त्रीय कथाओं आदि में संपूर्ण वर्णित किया, ताकि मानव उन पर तथ्यातथ्य विचार करके उन्हें अपनाए, सुधार लाये या त्यागे |
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                       माधवी की कथा में उसे तीन राजाओं और अंत में गुरु विश्वामित्र को सपुत्र प्राप्ति हेतु सौपा गया । यद्यपि उस काल में यह एक बुराई नहीं अपितु समाज में स्त्री की सर्व-स्वीकृत सार्वभौम स्वतंत्रता व महत्ता थी | स्त्री के शरीर की अपेक्षा आत्मा व मन की स्वच्छता व सौन्दर्य शुचिता की महत्ता थी | --------यद्यपि आज के लेखकों भीष्म साहनी के नाटक एवं अन्य कहानियों में इसे महाभारत की मूलकथा से कुछ अवांतर करके प्रस्तुत किया गया है जिसमें आज के युग के चिंतन-भाव, नारी-विमर्श एवं पौराणिक तथ्यों को विकृत व तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने का भाव उपस्थित है |
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                      नहुष कुल में उत्पन्न चन्द्रवंश के राजा ययाति की पुत्री माधवी की इस कथा का वर्णन महाभारत के उद्योगपर्व में है। माधवी राजपुत्री थी पर उसके पिता ययाति ने उसे इसलिए गालव ऋषि को सौप दिया ताकि वो उसे अन्य राजाओं को सौप कर अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु दक्षिणा में देने के लिए 800 श्वेतवर्णी श्यामकर्ण अश्व प्राप्त कर सके।
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गुरु विश्वामित्र के शिष्य ऋषि गालव अत्यंत गरीब थे यह जानकर विश्वामित्र ने उन्हें गुरु दक्षिणा शुल्क से मुक्त करदिया था, परन्तु गालव को यह अच्छा नहीं लग रहा था अतः वे उन्हें देने के लिए गुरु दक्षिणा माँगने लेने की जिद पर लिए पर अड़ गए | नाराज़ होकर विश्वामित्र ने ८०० श्याम-कर्ण घोड़े मांग लिए, जो अत्यंत दुर्लभ प्रजाति थी |
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घोड़ों की व्यवस्था हेतु गालव की सहायता हेतु उनके मित्र गरुड़ आगे आये उन्होंने प्रतिष्ठानपुर के स्वामी महाराज ययाति की शरण में चलने की प्रेरणा दी। महाराज ययाति का उन दिनों धरती के राजाओं में सर्वाधिक सम्मान था। राजा ययाति प्रसन्न हुए परन्तु संयोगवश उस समय उनकी स्थिति वैसी नहीं थी जैसी कि गरुड़ समझते थे। अनेक राजसूय और अश्वमेध यज्ञों में उन्होंने अपना सम्पूर्ण कोष रिक्त कर दिया था।
---------कुछ क्षण गम्भीर सोच विचार के उपरांत उन्होंने अपनी त्रेलोक्य सुन्दरी कन्या माधवी को समर्पित करते हुए गालव से कहा कि ऋषिकुमार मेरी यह कन्या दिव्य गुणों से अलंकृत है। माधवी को यह वरदान था कि वह चक्रवर्ती सम्राट को जन्म देगी और जन्म के पश्चात एक अनुष्ठान द्वारा चिर कुमारी हो सकेगी| दैवी वरदान के अनुसार इसके द्वारा हमारे देश में चार महान राजवंशों की प्रतिष्ठा होगी। इसे संग लेकर आप पृथ्वी के अन्य राजाओं के पास जाइए। ऐसी सर्वगुण संपन्न एवं सुन्दरी के शुल्क के रूप में राजा लोग अपना राज्य तक दे सकते हैं, फिर आठ सौ श्यामकर्ण अश्वों की तो बात ही क्या है| परन्तु प्रार्थना है की अपना कार्य पूर्ण करने के उपरांत आप मेरी कन्या मुझे लौटा देंगे |
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माधवी को संग लेकर गरुड़ और गालव सर्वप्रथम संसार भर से चुने हुए अश्वों को रखने के कारण विख्यात एवं दानशीलता, शूरता, परदुःख-कातरता तथा समृद्धि के कारण धरती भर में प्रसिद्ध अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास पहुँचे | उन्होंने जब अपना मन्तव्य प्रकट किया, किन्तु विडम्बना यह थी कि उनके पास वैसे श्यामकर्ण अश्वों की संख्या केवल दो सौ थी। हर्यश्व ने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए गालव और गरुड़ को यह सुझाव दिया कि आपको मेरे ही समान अन्य राजाओं से भी माधवी के शुल्क के रूप में वैसे श्यामकर्ण अश्वों की प्राप्ति का उपाय करना होगा। मैं अपने दो सौ अश्वों को देकर माधवी से केवल एक पुत्रोत्पत्ति की प्रार्थना करूँगा।
------दूसरा कोई चारा न होने के कारण गालव और गरुड़ ने अयोध्यापति हर्यश्व की बात मान ली और माधवी को अयोध्या में निर्दिष्ट अवधि के लिए छोड़ दिया| यथा समय राजा हर्यश्व के संयोग से माधवी ने वसुमना नामक पुत्र को उत्पन्न किया, जो बाद में चलकर अयोध्या के राजवंश में परम प्रसिद्ध हुआ।
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तदनंतर गालव और गरुड़ काशिराज दिवोदास के दरबार में पहुँचे, जिनकी कीर्ति-कौमुदी का प्रसार उन दिनों समग्र भूमण्डल में हो रहा था। गालव और गरुड़ के प्रस्ताव करने पर वह भी अपने दो सौ श्यामकर्ण अश्वों को देकर माधवी जैसी सुन्दरी तथा दैवी प्रभायुक्त स्त्री से एक पुत्र प्राप्त करने का लोभ संवरण न कर सके।
------- नियत समय बीत जाने पर माधवी के संयोग से काशिराज दिवोदास ने प्रतर्दन नामक पुत्र की प्राप्ति की, जो बाद में काशीराज्य का पुनरुद्धारक ही नहीं, प्रत्युत वंशपरम्परागत शत्रुओं का विध्वंसक भी हुआ।
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इस द्वितीय पुत्रोत्पत्ति के बाद गालव और माधवी, पक्षिराज गरुड़ के संग भोजराज उशीनर के यहाँ पहुँचे, भोजराज की अतिशय समृद्धि और अदम्य दानशीलता की उन दिनों पृथ्वी पर बड़ी चर्चा थी। किन्तु संयोगतः उनके पास भी दो सौ श्यामकर्ण अश्व थे। गालव और गरुड़ की प्रार्थना पर राजा उशीनर ने भी त्रैलोक्य-सुन्दरी माधवी के संयोग से एक पुत्र प्राप्त कर अपने उन दुर्लभ अश्वों को उन्हें सौंप दिया।
-------- भोजराज का यही तेजस्वी पुत्र बाद में शिवि के नाम से विख्यात हुआ, जिसकी दान-शीलता की अमर कहानी आज भी पुराणों की शोभा है। इस पुत्र की उत्पत्ति के बाद भी माधवी का रूप-यौवन पूर्ववत् बना रहा।
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गालव को अपनी गुरु-दक्षिणा के लिए अब दो सौ अश्व ही शेष थे, गालव द्वारा विश्वामित्र से प्राप्त की गयी अवधि समाप्ति पर थी और गरुड़ को यह ज्ञात हो चुका था कि धरती पर इन छह सौ श्यामकर्ण अश्वों के सिवा कहीं अन्यत्र एक भी नहीं बचा है |
------अन्ततः छह सौ अश्वों और त्रैलोक्य-सुन्दरी माधवी तथा गरुड़ को संग लेकर वह विश्वामित्र के समीप पहुँचे और शेष दो सौ अश्वों की प्राप्ति में असमर्थता प्रकट करते हुए विनय भरे स्वर में कहा-‘‘गुरुवर! आपकी आज्ञा से इस भूमण्डल पर प्राप्त छह सौ श्यामकर्ण अश्वों को मैं ले आया हूँ, जिन्हें आप कृपा कर स्वीकार करें। अब इस धरती पर ऐसा एक भी अश्व नहीं बचा है। अतः मेरी प्रार्थना है कि शेष दो सौ अश्वों के शुल्क के रूप में आप दिव्यांगना माधवी को अंगीकार करें।’’गालव की प्रार्थना का अनुमोदन गरुड़ ने भी किया। -------विश्वामित्र ने अपने प्रिय शिष्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली और माधवी के संयोग से अन्य राजाओं की भाँति उन्होंने भी एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति की, जो कालान्तर में अष्टक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनकी राजधानी का सारा कार्य-भार ग्रहण किया और माधवी के शुल्क के रूप में प्राप्त उन छह सौ दुर्लभ श्यामकर्ण अश्वों का भी वही स्वामी हुआ।
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इन चारों पुत्रों की उत्पत्ति के बाद माधवी ने गालव को उऋण करा दिया। फिर वह अपने पिता राजा ययाति को वापस कर दी गयी | उसके अनन्त रूप और यौवन में चार पुत्रों की उत्पत्ति के बाद भी कोई कमी नहीं हुई थी।
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अपने इन चारों यशस्वी पुत्रों की उत्पत्ति के बाद जब वह पिता के घर वापस आयी, तो पिता ने उसका स्वयंवर करने का विचार प्रकट किया। किन्तु माधवी ने किसी अन्य पति को वरण करने की अनिच्छा प्रकट कर तपोवन का मार्ग ग्रहण किया।






रविवार, 20 अगस्त 2017

राष्ट्रीय पुस्तक मेले में दिनांक १९-८-१७ शनिवार को-लेखक से मिलिए कार्यक्रम..डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


राष्ट्रीय पुस्तक मेले में दिनांक १९-८-१७ शनिवार को-लेखक से मिलिए कार्यक्रम..डा श्याम गुप्त

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गुरुवार, 17 अगस्त 2017

पुस्तक मेला में नव सृजन की गोष्ठी व पुस्तक लोकार्पण -दि,१६-८-१७ ... डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ.


पुस्तक मेला में नव सृजन की गोष्ठी व पुस्तक लोकार्पण -दि,१६-८-१७ ...


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पुस्तक मेला लखनऊ ---ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ' का लोकार्पण--डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पुस्तक मेला लखनऊ ---
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मोतीमहल लान में चलरहे पुस्तक मेले में आज दिनांक १४-८-१७ को अखिल भारतीय अगीत परिषद् ,लखनऊ द्वारा एक कवि सम्मलेन का आयोजन मेले के मुख्य पंडाल में संपन्न हुआ |
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---- मुख्य अतिथि डा सुलतान शाकिर हाशमी पूर्व सदस्य केन्द्रीय योजना आयोग, विशिष्ट अतिथि साहित्याचार्य डा श्याम गुप्त , विशेष अतिथि श्री त्रिवेणी प्रसाद दुबे एवं अध्यक्षता साहित्यभूषण साहित्याचार्य श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा मंच को विभूषित किया गया |
संचलान डा योएश गुप्ता द्वारा किया गया एवं ...
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---वाणी वन्दना श्रीमती सुषमा गुप्ता ने की |
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डा श्याम गुप्त की पुस्तक ' ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ' का लोकार्पण किया गया |
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-----मेला आयोजक श्री देवराज अरोरा को समाज भूषण सम्मान से विभूषित किया गया |
----लगभग ६० कवियों -कवयित्रियों ने काव्यपाठ किया |
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डा श्याम गुप्त को साहित्याचार्य की उपाधि ---

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 डा श्याम गुप्त को साहित्याचार्य की उपाधि ---

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'नवसृजन' साहित्यिक संस्था का नवाँ वार्षिकोत्सव---डा श्याम गुप्त को 'साहित्याचार्य '.की उपाधि

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                             दिनांक 13/08/2017 को राजधानी की प्रसिद्धि 'नवसृजन' साहित्यिक संस्था का नवाँ वार्षिकोत्सव मनाया गया जिसमें प्रतिवर्ष दिए जाने वाले वार्षिक सम्मान --वरिष्ठ कवि श्री कुमार तरल जी को -सृजन साधन वरिष्ठ रचनाकार सम्मान व मुकेश कुमार मिश्रा को सृजन साधना युवा रचनाकार सम्मान 2017 प्रदान किया गया।
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विशिष्ट सम्मान में--साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य को 'साहित्याचार्य श्री ' एवं डा श्याम गुप्त को 'साहित्याचार्य '.की उपाधि से सम्मानित किया गया |
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-----समारोह के अध्यक्ष आदरणीय रंगनाथ मिश्र सत्य ,मुख्य अतिथि सेवा निवृत्त पुलिस महानिदेशक व साहित्यकार श्री महेश चन्द्र द्विवेदी जी,विशिष्ट अतिथि पूर्व भाषा विज्ञान की विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर ऊषा सिन्हा जी व पूर्व सदस्य योजना आयोग भारत सरकार डाक्टर सुल्तान शाकिर हाशमी जी थे।
कार्यक्रम का संचालन युवा कवि श्री देवेश द्विवेदी 'देवेश' जी ने किया ।इस अवसर पर सीवान बिहार से आये वरिष्ठ कवि श्री परमहंस मिश्र प्रचंड जी सहित लखनऊ व आसपास के लगभग एक सौ कवि गण उपस्थिति रहे।

--------वाणी वन्दना श्रीमती सुषमा गुप्ता व वाहिद अली वाहिद ने की \
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इस अवसर पर डा योगेश गुप्त द्वारा संपादित साझा काव्य संकलन -श्रृंगिनी -का विमोचन भी हुआ जिसमें युवा कवियों-मुकेश कुमार मिश्रा , मनु बाजपेयी ,लव परवाना,विशाल मिश्र ,अनूप शुक्ल ,देवेश द्विवेदी व सम्पादक डाॅ. योगेश गुप्त जी की रचनाएँ शामिल हैं ।
---छोटी छोटी बच्चियों द्वारा मनमोहक नृत्य में गजानन वन्दना प्रस्तुत की गयी |

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पुस्तक शृंगिनी का लोकार्पण



 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

श्रीकृष्ण--त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता---डा श्याम गुप्त...

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष------
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श्रीकृष्ण--त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता---
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श्रीकृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान रूप हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण विकास आत्मतत्व का जागरण है। जीवन त्रिगुणात्मक प्रकृति सत रज व तम से उद्भूत और विकसित होता है प्रकृति का तमस तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने का प्रयास करता है |
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-----तीन माताएं-----
त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में श्रीकृष्ण की तीन माताएँ हैं।
१.रजोगुणी प्रकृति रूपा देवकी जो जन्मदात्री माँ हैं व सांसारिक माया गृह में कैद हैं।
२.सतोगुणी प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके वात्सल्य -प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण बड़े होते हैं।
३.इनके विपरीत एक घोर तमस रूपा प्रकृति भी शिशु-भक्षक सर्पिणी के समान पूतना माँ है, जिसे आत्मतत्व का प्रस्फुटित अंकुरण नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान कराती है।
---------संदेश है कि प्रकृति का तमस तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने में असमर्थ है।
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------गोकुल -----
शब्द का अर्थ इंद्रियाँ भी हैं, गोकुल का अर्थ है हमारी पंचेद्रियों का संसार और
------- वृन्दावन का अर्थ है वृन्द जन जन की वाटिका, जन जन का मन और
------- तुलसीवन अर्थात मन का उच्च गतिमय क्षेत्र तुर, तुरय, तुरंत तुरस, तुलसी |
-----इन्हीं में पूतना वध, शकट भंजन और तृणावर्त वध का तथा वृंदावन में बकासुर, अधासुर और धेनुकासुर आदि अनेक राक्षसों के हनन का वर्णन है जो मानव मन की अतीन्द्रिय क्षमता का उपाख्यान रूप है |

----- गोवर्धन धारण, गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन - पालन पोषण आदि आर्थिक, नीति-परक और राजनीतिक व्याख्याएं हैं। आध्यात्मिक संकेत है कि इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी दृष्टि होना चाहिए।
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----- रासलीला----
इसी प्रकार गोपियों के साथ रासलीला के वर्णन में मन की वृत्तियां ही गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं और प्रत्येक वृत्ति के रासलीला या रस-नृत्य के रूप में सराबोर होने का चित्रण है। इससे भी उच्च अवस्था का प्रेम व विरह का वर्णन महारास है | यह द्वैत का एक आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने की चित्रण है |
-------कंस -----
श्रीकृष्ण को किशोर वय होने पर कंस उन्हें मरवा डालने का एक बार फिर षड्यंत्र रचकर मथुरा बुलवाता है, किंतु श्रीकृष्ण उसको उसके महाबली साथियों सहित मार डालते हैं। कंस देहासक्ति का मूर्तिमान रूप है, जो संभावित मृत्यु से बचने के लिए कितने ही कुत्सित कर्म करता है।
---------मथुरा देहासक्ति से विक्षुब्ध मन है ।
----द्वारिका-----
द्वारिका शब्द में द्वार का अर्थ है साधन, उपाय या प्रवेश मार्ग। समुद्र व्यक्तित्व के गहरे तल- आत्म क्षेत्र को इंगित करता है। अतः आत्म क्षेत्र का प्रवेश द्वार है द्वारिका
-------कंस वध करने के उपरांत द्वारिका में राज्य स्थापना करने का अर्थ है कि आत्मभाव में प्रवेश के पूर्व देहासक्ति की समाप्ति आवश्यक है। इस क्षेत्र में चेतना का प्रवेश होने पर जीवन जीने का जैसा स्वरूप होगा, उसका निरूपण द्वारिका पर श्रीकृष्ण राज्य के रूप में किया गया है। इस क्षेत्र का परिचय महाभारत में श्रीकृष्ण के लोकहितार्थ और धर्मस्थापनार्थ किए गए कार्यों द्वारा तथा गीता के अंतर्गत उनकी वाणी द्वारा किया गया है।
------- व्यक्ति भी संकल्प करे तो उसकी चेतना भी कृष्ण की भांति विकसित हो सकती है।
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-------- श्री  अर्थात राधा, आदिशक्ति, प्रकृति से सदा सर्वदा सायुज्य श्रीकृष्ण जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है ऐसे पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण को बारम्बार प्रणाम |