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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 7 मार्च 2009

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ०८-०३-०९ के लिए विशेष .

मेरे न खेलने पर ,
तुम्हारा भी वाक् आउट ,
मेरे झगड़ने पर भी ,
तुम्हारा मुस्कुराना ,
नाराज होने पर ,
एक दूसरे को मनाना;
जीवन कितना था सुहाना ,
हे सखि
जीवन कितना था सुहाना। (काव्य-दूत से )

सौन्दर्य की कितनी विधाएं हैं ,
कितने रूप, कितनी कृतियाँ हैं ,
तुम्हारे अन्तर मैं ?
हे सखि !,प्रेयसि,प्रियतमा ,
पत्नी ,देवी ,शक्ति ,कामिनी ,
तुम अद्भुत हो !तुम अद्भुत हो। (काव्य-दूत )

अपने मन की साध जगाकर ,
शिक्षा की ऊंचाई पाये ।
उन्नति के सोपानों पर चढ़ ,
सारी दुनिया पर छाजाये ।
हाथ बढाकर कर नभ को छूले ,
अपनी मुक्ति की खिड़की खोले ;
नारी अपने बंधन खोले । (काव्य-nirjhranee से )

नारी भाव नहीं था जब तक तक ,
फलित सृष्टि की स्वतः प्रक्रिया ,
कैसे भला सफल हो पाती ?
आदि -शक्ति का हुआ अवतरण ,
हुआ समन्वय नर-नारी का ;
पूर्ण हुआ क्रम , सृष्टि -यज्ञः का ।। (सृष्टि महाकाव्य से )

कहानी हमारी- तुम्हारी न होती ,
न ये गीत होते ,न संगीत होता ।
सुमुखि!तुम अगर जो हमारे न होते ,
सजनि ! जो अगर हम तुम्हारे न होते । (प्रेम -काव्य से )

नारी केन्द्र -बिन्दु है भ्राता ,
व्यष्टि ,समष्टि ,राष्ट्र की ,जग की ।
इसी लिए तो वह अबध्य है ,
और सदा सम्माननीय भी ।
लेकिन वह भी तो मानव है ,
नियम- निषेध मानने होंगे । (शूर्पनखा काव्य- उपन्यास से )

हाल ऐ पुदिरे -हि. ०७-०३-०९.

बहुत ही सही लिखा है नीरज बधवार ने --सिर्फ़ पुराणी दिल्ली का ही यह हाल नहीं है , सारे देश का ही यह हाल है ,यह तो पतीली मैं एक चावल के दर्शन हैं । लालूजी ही नहीं जो रेल मैं लाभ ही लाभ दिखाकर मनेजरों के गुरु बन बैठे हैं ,, और आई आई ऍम , आदि बिजनेस कोल्लेजों को तो धंधा चाहिए ,चाहे गंगू तेली से ही क्लास करवादी जाय । आज कल सारे स्वयम्भू गुरुओं का यही हाल है। सब 'गुरू ' ही हैं ; हर क्षेत्र मैं। जैसा राजा तैसी प्रजा ; लालू ही नहीं सारे रेल के अधिकारी ही आंकडों के खेल पर दनादन प्रोमोशन , पद पाते रहते हैं।