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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

अतुकांत कविता --अगीत -रस ,छंद ,गति व लय.

बालू से सागर के तट पर ,
खूब घरोंदे गए उकेरे ।
वक्त की ऊंची लहर उठी जब ,
सब कुछ आकर बहा ले गयी ।
छोड़ गयी कुछ घोंघे -सीपी ,
सजा लिए हमने दामन मैं। ----प्रेम काव्य (प्रेम अगीत ) से लयबद्ध अगीत

सभी जीव मैं वही ब्रह्म है ,
मुझमें तुझमें वही ब्रह्म है।
उसी एक को समझ के सब मैं,
मान उसी को हर कण- कण मैं ।
तिनके का भी दिल न दुखाये ,
सो प्रभु को ,परब्रह्म को पाये। ----श्रृष्टि ,अगीत विधा महा काव्य से -शटपदीअगीत

शूर्प सुरुचिकर लंबे नख थे ,
रूपवती विदुषी नारी थी ।
साज श्रृंगार वेश भूषा से -
निपुण, विविध रूपसज्जा मैं ।
नित नवीन रूप सजने मैं ,
उसको अति प्रसन्नता होती । --शूर्पनखा काव्य उपन्यास से (छह पदी अगीत )

भ्रमर !
तुम कली- कली का ,
रस चूसते हो ,
क्यों ?
बगिया की गली -गली घूमते हो ,
क्यों ? ---अगीत। (भ्रमर गीत से )

और एक छह पदी सवैया --
प्रीति मिले सुखरीति मिले, धन- मीत मिले सब माया अजानी ।
कर्म की,धर्म की,भक्तिकीसिद्धि-प्रसिद्धि मिले सब नीति सुजानी ।
ज्ञानकीकर्मकी अर्थकी रीति ,प्रतीति सरस्वती-लक्ष्मी की जानी ।
रिद्धि मिली सब सिद्धि मिलीं, बहुभांति मिलीं निधि वेद बखानीं ।
सब आनंद -प्रतीति मिलीं , जग प्रीति मिली बहु भांतिसुहानी ।
जीवन गति सुफल -सुगीत बनी मन जानी , जग पहचानी ।। ---प्रेम काव्य से।

दोष मेरा है

वोट और मुद्दों पर डाक्टरों के विचार ,अध्यात्म की राह -उमा पाठक ,पोथी ही न पढाएं -जीवन मूल्य भी सिखाएं -पुष्पेश पन्त ; सभी पढ़कर लगता है किवास्तविक राय यही है कि ---
आज जब मैं हर जगह ,
छल द्वंद्व द्वेष पाखण्ड झूठ ,
अनाचार अत्याचार व अन्याय -
को देखता हूँ ;
उनके कारण और निवारण पर ,
विचार करता हूँ ,
तो मुझे लगता है कि -
दोषी मैं ही हूँ ,
सिर्फ़ मैं ही हूँ ।

आप लड़ें या झगडें ,
दोष चाहे एक दूसरे पर मढें,
दोष इसका है न उसका है न तेरा है ,
मुझे शूली पर चढादो ,
दोष मेरा है। --------काव्य मुक्तामृत से ।
स्थित सुधरेगी ,आशा बाकी है।