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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

अगीत विधा

कविता जगत मैं अगीत विधा का आजकल काफ़ी प्रचलन है .। यह विधा १९६६ से डा रन्ग नाथ मिश्र सत्य द्वारा प्रच्लित की गयी है। अगीत एक छोटा अतुकान्त गीत -रचना है, ५ से ८ पन्क्तियों की। जो निराला जी के लंबे अतुकांत गीतों से भिन्न है । यथा-

चोरों ने सन्गठन बनाये ,
चालें चल हरिश्चन्द्र हटाये,
सत्ता मैं आये ,इठलाये,
मिल कर चोर- चोर चिल्लाये,
जनता सिर धुनकर पछताये।
अब तक इस विधा की बहुत सी काव्य कृतियाँ प्रकाशित होचुकीं हैं। अब श्री जगत नारायन पांडे व
डा श्याम गुप्त द्वारा अगीत महाकाव्य,खन्ड काव्य लिखे गये हैं।--
महाकाव्य--
-सौमित्र गुणाकर ( श्री ज.ना. पान्डे--श्री लक्षमण जी के चरित्र चित्रण पर)
- सृष्टि (ईषत इच्छा या बिगबैन्ग-एक अनुत्तरित उत्तर)-डा श्याम गुप्त
खन्ड काव्य-
-मोह और पश्चाताप( ज.ना. पान्डे- राम कथा )
-शूर्पनखा (डा श्याम गुप्त)
आज इस विधा मैं सात प्रकार के छन्द प्रयोग होरहे हैं--
१.अगीत छन्द -अतुकान्त ,५ से ८ पन्क्तियां
२. लयबद्ध अगीत--अतुकान्त,५ से १० पन्क्तियां,लय व गति युक्त
३ .गतिबद्ध सप्त पदी अगीत -सात पन्क्तियां, अतुकान्त ,गतिमयता
४ .लयबद्ध षट्पदी अगीत-छ्ह पन्क्तियां,१६ मात्रा प्रत्येक मैं निश्चित ,लय्बद्धता
५.नव अगीत -अतुकान्त ,३ से ५ तक पन्क्तियां,
६ .त्रिपदा अगीत --तीन पन्क्तियां,१६ मात्रा निश्चित ,लय,गति ,तुकान्त बन्धन नहीं
७,त्रिपदा अगीत गज़ल --त्रिपदा अगीत की मालिका,प्रथम छन्द की तीनों पन्क्तियों
मैं वही अन्त्यानुप्रास,अन्य मैंअन्तिम पन्क्ति मैंवही शब्द आए ।
ageet के udaaharan --
इधर udhar जाने से kyaa hogaa ,
मोड मोड़ पर जमी हुई हैं,
परेशानियां,
शब्द शब्द अर्थ रहित
कह रहीं कहानियां;
मन को बह्यलाने से क्या होगा ।--डा रन्ग नाथ मिश्र सत्य

२.लय बद्ध अगीत -
तुम जो सदा कहा करतीं थीं,
मीत सदा मेरे बन रहना ,
तुमने ही मुख फ़ेर लिया क्यों,
मैंनें तो कुछ नहीं कहा था।
शायद तुमको नहीं पता था ,
मीत भला कहते हैं किसको।
मीत शब्द को नहीं पढा था ,
तुमने मन के शब्द कोश में। --डा श्याम गुप्त (प्रेम काव्य से )

३,गतिमय सप्त पदी अगीत छन्द--
छुब्द होरहा है हर मानव ,
पनप रहा है वीर निरन्तर,
राम और शिव के अभाव में,
विकल हो रहीं मर्यादायें;
पीडाएं हर सकूं जगत की,
ग्यान मुझे दो प्रभु प्रणयन का। --जगत नारायण पान्डे (मोह और पश्चाताप से)

४,लय बद्ध षट पदी अगीत-
परम व्योम की इस अशान्ति से ,
द्वन्द्व भाव कण-कण मएं उभरा ।
हल चल से गति मिली कणों को,
अपः तत्व में साम्य जगत के ।
गति से आहत नाद बने फ़िर ,
शब्द,वायु,ऊर्जा,जल और मन ॥ -डा. श्याम गुप्त (स्रिष्टि-महा काव्य से )

५,नव-अगीत छन्द--
बेडियां तोडो,
ग्यान दीप जलाओ,
नारी! अब -
तुम्ही राह दिखाओ;
समाज को जोडो. । -सुषमा गुप्ता

६.त्रिपदा अगीत छन्द-
प्यार बना ही रहे हमेशा ,
एसा सदा नहीं क्यों होता ;
सुन्दर नहीं नसीब सभी का । - डा श्यम गुप्त

७, त्रिपदा अगीत हज़ल-
बात करें
भग्न अतीत की न बात करें,
व्यर्थ बात की क्या बात करें;
अब नवोन्मेष की बात करें।

यदि महलों मैं जीवन हंसता,
झोंपडियों में जीवन पलता;
क्या ऊंच नीच की बात करें।

शीश झुकायें क्यों पश्चिम को,
क्यों अतीत से हम भरमायें;
कुछ आदर्शों की बात करें ।

शास्त्र ,बडे बूडे ओ बालक,
है सम्मान देना पाना तो;
मत श्याम व्यन्ग्य की बात करें ।--डा श्याम गुप्त

कुछ मुख्य कवियों के नाम --१.
१, डा ऊषा गुप्ता -प्रोफ़ेसर हिन्दी विभाग ,लखनऊ वि वि , प्रेरक ।
२ डा रंग नाथ मिश्र सत्य --संस्थापक व प्रवर्तक
३ श्री जगत नारायण पांडे -प्रथम अगीत महाकाव्यव खंड काव्य के रचयिता
४ डा श्याम गुप्ता --मूर्त संसार व अमूर्त ईश्वर पर प्रथम महाकाव्य एवं खंड काव्य रचयिता एवं अगीत के विभिन्न छंदों के प्रवर्तक
५ सोहन लाल सुबुद्ध
६ पार्थो सेन -----अन्य देश ,विदेश मैं फैले हुए बहुत से कविगण .......

एक नज़्म --प्रीति रस

प्रेम रस वो पिलादे ऐ साकी ,
रह न जाए कोई प्यास बाकी ।

कल रहें ना रहें क्या पता ,
कब न जाने हो ' कल ' क्या पता।
जाने क्या लेके आए सहर ,
है अभी तो बहुत रात बाकी।

कल कहाँ होंगे जीवन के मेले ,
जाने क्या क्या न होंगे झमेले।
ऐसी तन्हा नहीं रात होगी ,
प्यार की ये घड़ी फ़िर न होगी।

यूँ ही जाने न दे रात बाकी ,
है अभी कुछ मुलाक़ात बाकी।

हाले दिल कुछ कहें कुछ सुनाएँ ,
रंग जीवन के भी गुनुगुनाएं ।
रागिनी- राग के स्वर सजें ,
राज तन मन के पूछें बताएं।

रह न जाए कोई साध बाकी ,
ऐसी हाला पिलादे ऐ साकी ।

ऐसी हाला भरा एक प्याला ,
प्रीति रस जिसमें छक कर हो डाला ।
भक्ति के भाव रस का समर्पण ,
संग मनुहार चितवन के ढाला।

हस्ती मिट जाय मेरी ओ तेरी ,
नाम प्रभु का ही रह जाय बाकी।

प्रेम प्याला पिलादे ओ साकी ,
रह न जाए कोई प्यास बाकी॥
--डा श्याम गुप्त