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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 18 मई 2009

लोकतंत्र व चुनाव परिणाम के अर्थ

'लघु है पर विभु अर्थ बताये ,उसे मन्त्र कहते हैं ,
लघु काया बहु भार उठाये , उसे यंत्र कहते हैं ।
मिलें बीस प्रतिशत 'मत' जिसको उस नेता की -
बन जाए सरकार ,उसी को लोकतंत्र कहते हैं।। "
चुनाव परिणाम कुछ ख़ास दिशा नहीं अपितु जनता की अपने लाभ के प्रति ललक , युवा लोगों की कोई ख़ास दिशा न होकर प्राचीन को नकारना ,अपनी संस्कृति का विरोध ,नवीन के प्रति विना सोचे दौड़ का परिणाम है। विशिष्ट विषय व घटनाओं पर मुस्लिम व दलित वोटों का --जैसा चलरहा है वैसा ही चलता रहे -मध्यम मार्गी अपने स्वार्थवश लाभ --ध्रुवी करण है। पाश्चात्य रंग लिए ,हिन्दी ,हिन्दू,हिन्दुस्तान के विरुद्ध ,ध्रुवी करण है
लोकतंत्र -जनता का राज्य,जनता द्वारा ,जनता के लिए -अर्थात--जनता शासक,जनता चोर ,जनता दोषी,जनता न्यायाधीश ,, तो किसे कौन सज़ा दे ,क्यों दे ?,किसके लिए दे ? कोई किसी के प्रति जिम्मेवार नहीं। अतः जनता को स्वआत्मानुशाशन से नियमन करना ही चाहिए।
राज्य तंत्र --राजा दोषी व जिम्मेवार ,वह प्रजा को दंड देकर नियमित रखता है । जनता राजा के कार्यों पर niyantran - विभिन्न संस्थाए -पंचायत,विद्वत मंडली आदि द्वारा । परन्तु --राजा हो चोरी करे ,न्याय कौन पर जाय ? वाली स्थिती हो तो । अर्थात व्यक्तियों को स्व.नियमन करना पडेगा ।
अर्थात --हर परिस्थिति में व्यक्ति को स्वयं ही सदाचरण ,सद -व्यवहार वाला,कर्तव्य निष्ठ ,ईमान दार होना चाहिए ,हर व्यक्ति को , राज्य पद,अधिकार के पदों पर जो हैं उनका दायित्व अधिक होता है। तथा चाहे लोकतंत्र हो या राज्य तंत्र कोई फर्क नहीं पङता । तंत्र स्वयं में जड़ बस्तु है अच्छा-बुरा उसके गुणनहीं ;अच्छा बुरा जीव ,व्यक्ति होता है। उसे ही अच्छा होना चाहिए सब कुछ ठीक होगा।
यही तो धर्म कहता है। और जिसे हम भूल गए हैं। और यथा स्थित वादी -जैसा हे चलने दो वालों को समर्थन दे रहे हैं।