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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 16 जून 2009

"ह्रदय तराजू तौल के तब मुख बाहर आनि --छोटी-छोटी बातें"

कुछ ऐसी छोटी-छोटी बातें होतीं हैं जो देखने में एक दम साधारण लगतीं हैं , जिन्हें हम अनायास ही कहते, सुनते व हंसकर टाल जाते हैं, परन्तु वे :सतसैया के दोहरे,ज्यों नाविक के तीर" की भांतिजन मानस में ओर फ़लस्वरूप समाज़ में गहन प्रभाव डालतीं है ओर अनियमित व्यवहार की पोषक होकर, अकर्म,अनाचार,भ्रष्टाचार व नैतिक पतन का कारक बनतीं हैं। ये मीठी छुरी की भांति गहरा वार, सुरा की भांति मादक प्रभाव दालतीं है ओर आस्तीन के सांप की भांति अन्तरतम में पैठ कर यथा - प्रभाव छोडतीं हैं।हमें ऐसी बातों को बडी सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये, अपितु ऐसे सपोले -जुमलों को आदत बनने से पहले ही नष्ट करदेना चाहिये। कुछ बातें निम्नहैं :----

---कौन पूछता है? ,,कौन देखता है?,,,ज्यादा दिल पर मत लो,,,दिल पर मत ले यार,,,अरे छोडो !,,,सब चलता है,,,
हमही गान्धी बनने को हैं क्या?,,,हर बात में राज नीति न करो,,,रिलीजन इज़ फ़ेनेटिस्म,,,उदार वादी बनो,,,साम्प्रदाय वादी हैं,,,व्यवहारिक द्रष्टिकोण रखें,,,चलती का नाम गाडी,,,कौन दूध का धुला है?,,,थोडी सी वेबफ़ाई,,,आटे में नमक के बराबर (भ्रष्टाचार-बेईमानी-बेगैरती) चलता है,,,मैं तो बस यूं ही मज़ाक ...,,,, नेति-नेति .........
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