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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 20 दिसंबर 2009

आज के दिन ---डॉ श्याम गुप्त की कविता ..

आज के दिन

तुमने कहा था-
आज के दिन ,
कितने खुश थे हम सब
सजल नयनों से |
मैंने भी सजाये थे ,
स्वप्न रंगीले ; पिछले वर्ष -
जब आया था तुम्हारा सन्देश |

तुमने कहा था ,
आज के दिन कितनी भीड़ थी घर में ;
सारा घर था गया सजाया ,
एक हुए थे हम-तुम,
थी सब ओर,
हर्ष विषाद की मिली जुली छाया |

आज के दिन ,
हम पहाड़ों पर थे ;
छुआ था तुमने पहली बार ,
हुए थे एकाकार |
आज के दिन,
आई थी प्रथम खुशी,
आनंद का पारावार |

फिर तुम कहने लगीं -
पिछले साल आज के दिन,
वे चले थे अपने पैरों पर ,
पहली बार |
आज के ही दिन ,
वे गए थे स्कूल ,और-
आज के दिन गए थे कालिज,
पहली बार |

तुम कहती रहीं ,
कैसे नाच रहे थे सब लोग,
सज रही थी बेटे की बरात ,
पिछले वर्ष
आज के दिन |
कितनी भीड़ थी घर में ,
पिछले दिसंबर में ,
आज के दिन;
थी हर्ष विषाद की ,
सम्मिलित बहार ,
बस रहा था,
बेटी का घर-संसार |

तुम कहती हो,
आज के दिन ,
वे गए थे दार्ज़िल्लिंग ,
औए आज के दिन जापान,
पिछली साल।
और आयी थी,
वह प्रथम खुशी,
आज के दिन
पिछली साल ,
खिला उठा था ,
एक नया संसार,
आनंद का पारावार ॥