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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

कुम्भ मेला व भारत वासी ----डा श्याम गुप्त की कविता ---

भारतवासी कुम्भ मेला

आज बहुत दिन बाद आया हूँ ,
बाहर टूर पर
कुम्भ मेला , प्रयाग घाट,
प्रयाग और मेला ;
भारतीय संस्कृति के अटूट अंग|

कहाँ जारहे हैं ये सब,
कहाँ से आरहे हैं ये सब?
सिर घुटाये,अन्गौंछा डाले, हाथ में दंड
नंगे पाँव , परिव्राज़क की तरह |

एक समुद्र जैसे -
चारों और से उठकर समा जाता है,
सागर में , संगम में , और-
पुनः उसी में से निकलकर
फ़ैल जाता है चारों ओर जैसे-
" एको s हं बहुस्याम ",
एक ही ब्रह्म से सारा संसार निकलता है ,
पुनः उसी में समा जाता है

जहां मिला बैठ गए,
जो मिला खाया पीया,
जो मिला पहन लिया

घास पर, जमीन पर, रेल की पटरी पर ,
विश्राम करते हुए, या-
सुबह से शाम तक प्लेटफार्म पर,
गाडी का इंतज़ार करते हुए,
बाल, वृद्ध , युवा, महिलाएं;
कोइ जल्दी नहीं ,हडबड़ाहट नहीं,
जब गाडी आयेगी चले जायेंगे
धैर्य की, संतोष की साक्षात मूर्ति की तरह,
अपनी स्थिति से संतुष्ट ,
स्थिति प्रग्य, वीत रागी ,
साधू संतों की तरह ,
अपने में मस्त ग्राम्य वासी,
यही है भारत, भारतवासी

इसीलिये कहा जाता है,
भारत साधू संतों का देश है,
यहाँ का हर व्यक्ति साधु वेश है

यही है वास्तविकता ,
भारतीय जीवन की
संस्कृति की |
एक जन-ज्वार , बिना बुलाये,
देश के कोने कोने से ,
आया, रहा, चलागया,
कोइ भाषण बाज़ी, शोर,
झगड़ा टंटा

जबकि ,
आज का चार अक्षर पढ़ा युवक
चार क्षात्र, स्कूली लडके या नेता एकत्र हुए,
होगया घमासान, तोड़फोड़
शोर शरावा , नारे बाज़ी,
बिखरी मानसिकता,
विकृत संस्कृति,
प्रतिगामी समाज,
यही है तस्वीर आज॥