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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

देखिये -शास्त्रों का अर्थ-अनर्थ, गुड-गोवर कैसे होता है---


<----देखिये अर्थ का अनर्थ , जो सारे किये कराये पर पानी फेर सकता है एवं बच्चों को गलत उदाहरण पेश कर सकता है । आरुणी गुरु धौम्य की सुप्रसिद्ध गुरु- भक्ति कथा | इसके अंत में दिया गया निष्कर्ष , लेखक का स्वयं का निष्कर्ष है, जो अच्छी खासी गुरु भक्ति की सीख को ---गुरु को ही मिली सीख में बदल देता है।
घटना आरुणी की, शिष्य की, गुरु भक्ति के लिए है, परन्तु लेखक का कथन है -"पर इस शिष्यने गुरु को ही बहुत कुछ सिखा दिया " यह वाक्य इस कथा में नहीं है परन्तु अंग्रेज़ी ज्ञान , पाश्चात्य ज्ञान से तरंगितलोग ( या अनजाने में या अज्ञान वश ) हमारे बच्चों से अभिभावक व शिष्यों से गुरु , बहुत कुछ सीख सकते हैं , की निरर्थक भावना पर - अर्थात गुरुओं को ही शिष्य से सीखना चाहिए , पर चलते ही दिखते हैं|---इसे कहते हैं गुड-गोबर करना | जो अँगरेज़ , अमेरिकन व यूरोपीय विद्वान् बहुत पहले से योज़ना बद्ध तरीके से करते आरहे हैं|--पूरी कथा यह है---
महर्षि आयोदधौम्यके तीन शिष्य बहुत प्रसिद्ध हैं—आरुणि, उपमन्यु और वेद। इनमेंसे आरुणि अपने गुरुदेव के सबसे प्रिय शिष्य थे और सबसे पहले सब विद्या पाकर यही गुरुके आश्रमके समान दूसरा आश्रम बनाने में सफल हुए थे। आरुणि को गुरुकी कृपा से सब वेद, शास्त्र, पुराण आदि बिना पढ़े ही आ गये थे। सच्ची बात यही है कि जो विद्या गुरुदेव की सेवा और कृपा से आती है; वही विद्या सफल होती है। उसी विद्या से जीवन का सुधार और दूसरों का भी भला होता है। जो विद्या गुरुदेवकी सेवाकी बिना पुस्तकों को पढ़कर आ जाती है, वह अहंकार को बढ़ा देती है। उस विद्याका ठीक-ठीक उपयोग नहीं हो पाता।

महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम में बहुत-से शिष्य थे। वे सब अपने गुरुदेव की बड़े प्रेम से सेवा किया करते थे। एक दिन शामके समय वर्षा होने लगी। वर्षाकी ऋतु बीत गयी थी। आगे भी वर्षा होगी या नहीं, इसका कुछ ठीक-ठिकाना नहीं था। वर्षा बहुत जोरसे हो रही थी। महर्षिने सोचा कि कहीं अपने धान के खेत की मेड़ अधिक पानी भरने से टूट जायगी तो खेतमें से सब पानी बह जायगा। पीछे फिर वर्षा न हो तो धान बिना पानी के सूख ही जायँगे। उन्होंने आरुणि से कहा—‘बेटा आरुणि ! तुम खेतपर जाओ और देखो, कही मेड़ टूटनेसे खेत का पानी निकल न जाय।’
अपने गुरुदेव की आज्ञासे आरुणि उस समय वर्षा में भीगते हुए खेतपर चले गये। वहाँ जाकर उन्हेंने देखा कि धानके खेतकी मेड़ पर एक स्थान पर टूट गयी है और वहाँ से बड़े जोरसे पानी बाहर जा रहा है। आरुणिने वहाँ मिट्टी रखकर मेड़ बाँधना चाहा। पानी वेगसे निकल रहा था और वर्षा से मिट्टी गीली हो गयी थी, इसलिये आरुणि जितनी मिट्टी मेड़ बाँधनेको रखते थे, उसे पानी बहा ले जाता था। बहुत देर परिश्रम करके भी जब आरुणि मेड़ न बाँध सका तो वे उस टूटी मेड़के पास स्वयं लेट गये। उनके शरीरसे पानीका बहाव रुक गया।

रातभर आरुणि पानीभरे खेतमें मेड़से सटे पड़े रहे। सर्दी से उनका सारा शरीर अकड़ गया, लेकिन गुरुदेव के खेतका पानी बहने न पावे, इस विचार से वे न तो तनिक भी हिले और न उन्होंने करवट बदली। शरीरमें भयंकर पीड़ा होते रहने पर भी वे चुपचाप पड़े रहे।

सबेरा होने पर संध्या और हवन करके सब विद्यार्थी गुरुदेव को प्रणाम करते थे। महर्षि आयोदधौम्यने देखा कि आज सबेरे आरुणि प्रणाम करने नहीं आया। महर्षिने दूसरे विद्यार्थियोंसे पूछा—‘आरुणि कहाँ है ?’
विद्यार्थियों ने कहा—‘कल शामको आपने आरुणि को खेतकी मेड़ बाँधनेको भेजा था, तबसे वह लौटकर नहीं आया।’
महर्षि उसी समय दूसरे विद्यर्थियों को साथ लेकर आरुणि को ढूँढ़ने निकल पड़े। उन्होंने खेत पर जाकर आरुणि को पुकारा। आरुणि से ठण्ड के मारे बोला तक नहीं जाता था। उन्होंने किसी प्रकार अपने गुरुदेवकी पुकार का उत्तर दिया। महर्षि ने वहाँ पहुँचकर उस आज्ञाकारी शिष्यको उठाकर हृदय से लगा लिया, आशीर्वाद दिया—‘पुत्र आरुणि ! तुम्हें सब विद्याएँ अपने-आप ही आ जायँ।’ गुरुदेव के आशीर्वाद से आरुणि बड़े भारी विद्वान हो गए।