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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 4 अप्रैल 2010

सानिया की शादी व मन्त्री जी का गाउन उतारना......

----आज दो ज्वलंत समाचार हैं-----एक, सानिया की शादी ; दो-मन्त्री जी का गाउन उतारना।
-----(१) कोई शशि शेखर हैं जो जब से हिन्दुस्तान के मुख्य संपादक बने हैं अपने बडे से कालम में कुछ न कुछ लिखते रहते हैं; वे सानिया की शादी ( जो एक व्यक्तिगत मामला है समष्टिगत व देश का नहीं-उन्हें क्यों लिखने की आवश्यकता हुई ) पर वे जोधाबाई का उदाहरण पेश कर के कहते हैं कि मान सिंह ने बहन देकर अपने क्षेत्र में युद्ध बचा लिये।----क्या उनकी निगाह में औरतें--बहन, बेटियां, मां आदि वस्तुयें हैं जिन्हें देकर अपने को, अपने राज्य को, प्रज़ा को बचाया जा सकता है---नारी की कोई अपनी गरिमा, इच्छा नहीं है। बेचारे राणा प्रताप यूंही-मूर्खता में- दर-दर भागते फ़िरे , वे भी कोई बहन -बेटी अकबर को देकर अपने को बचा लेते। धन्य हैं आज के पत्रकार, संपादक।
----(२)-मन्त्रीजी के गाउन उतारने पर तमाम लोग-विद्यार्थी,सामान्य लोग,अन्ग्रेज़ी दां इन्फ़ोटेकी, व्यापारी -नाराज़ हें--कोई गाउन पहनने को गरिमा बता रहा है, कोई संस्क्रिति की पहचान, कोई पढे लिखे समाज़ की शोभा पहनना परम्परा की खिल्लीउडाना कहरहा है,-----क्या गाउन हमारी भारतीय परम्परा है जो हम उसे शोभा या सम्मान मानें। यह अन्ग्रेज़ों की दी हुई परम्परा है, इसे समाप्त करना ही चाहिये।
कुछ लोगों का कथन है कि उन्हें समारोह में भाग ही नही लेना चाहिये, पहनना ही नही चाहिये पर गाउन का अपमान ( गोया अन्ग्रेज़ों/काले अन्ग्रेज़ों का अपमान होगया) । वर्षों पहले मैने स्वयम अपने कालेज के दीक्षान्त समारोह का बहिष्कार इसीलिये किया था कि मुझे अन्ग्रेज़ी परम्परा /गाउन का से विरोध था, इसका मैने प्रचार भी किया था परन्तु क्या हुआ यह आज तक चलरहा है। मैं शक्ति सम्पन्न नहीं था अतह चुपचाप विरोध था।
तुलसी दास ने कहा है कि --"हरिहर निन्दा सुनहि जो काना, होइपाप गौघात समाना।
काटिय जीभ जो बूत बसाई, आंखि मूंदि नतु चलिय पराई॥"
----- मैने चोपाई के अन्तिम पद का अनुसरण किया था, मन्त्री जी ने तीसरे पद का ; मन्त्री जी समर्थ हैं उन्हें इस प्रकार का व्यवहार करना ही चाहिए । जबतक समर्थ लोग सशक्त व स्पष्ट विरोध नहीं करेंगे स्थितियां नहीं बदलेंगी।