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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 16 जून 2010

डा श्याम गुप्त की कविता ----पुनर्मूषकोभव ..........

पुनर्मूषको भव

हम रहते थे जंगल में ,
सभी थे मस्त,
अपने अपने खाने-पीने और-
आनंद मंगल में ।
नर-नर; नारी-नारी व नर-नारी में
कोई फर्क नहीं था, कोई अंतर्द्वंद्व नहीं था ;
था केवल द्वंद्व ;
किसी का किसी से नहीं था,
कोई सम्बन्ध ।

अपने लिए फल तोड़ना, शिकार खोजना;
नंगे रहना या छाल ओड़ना;
बलवान द्वारा, कमजोर का सिर तोड़ना ।
यही था मानव , और -
मानव के जीने का अंदाज़ ,
स्वच्छंद , निर्द्वंद्व, निर्विवाद
वर्ज़ना हीन समाज ।

नृवंश आगे बढे ,
एक दूसरे का सिर न तोड़ें न लड़ें ;
अपने अस्तित्व विनाश की और न बढ़ें ,
इसलिए , शैतान ने-
प्रेम रस युक्त, अमर फल बनाया,
आदम को खिलाया।
ज्ञान चक्षु खुले, फ़ैली माया ।
ज्ञान और प्रेम पृथ्वी पर समाया,
साथ में नियम, कायदे, क़ानून , कामनाएं, भावनाएं
क्या छोड़ें, क्या अपनाएं
विभिन्न वर्ज़नाएं लाया ।

समाज ने,
सत्य, धर्म, अध्यात्म, सदाचार अपनाया,
प्रतीक रूप में,
ईश्वर अस्तित्व में आया ।

दुनिया ने ,
प्रगति की राह पर कदम बढाए।
सभी ने अपने अपने अनुरूप-
कार्य बाँट लेने के नियम अपनाए ;
सभी को-
समता, भावना, कर्तव्य , संबंधों व-
परिवार वाद के मूल भाये ।
नर और नारी ने भी अपने अपने अनुरूप ,
कार्य व कार्य बंधन खुशी खुशी अपनाए।
सभी ने मिलकर--
" सर्वें सुखिना सन्तु , सर्वे सन्तु निरामया "
जैसे गीत गाये ।

आज यदि---
अंधी भौतिकता के दौड़ में ,
नर के सभी कार्य नारी ,
नारी के सभी कार्य नर, अपनाएंगे ;
सबके लिए उचित कार्य का बंटवारा
के नियम भुलायेंगे ;
वर्ज़नाहीन समाज के नारे लगायेंगे,
प्रेम, भावना, ज्ञान,धर्म-कर्म ईमान की बजाय-
खाने-कमाने के गीत गायेंगे ;
एक दूसरे की सिर फोड़ प्रतियोगिताएं अपनाएंगे;
तो क्या फिर से-
जंगल में जाकर घर बसायेंगे ॥