ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 24 नवंबर 2010

छिद्रान्वेषी -१. ---डा श्याम गुप्त....

" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है , इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(faultfinding). रन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं।
--------इसी विचित्र विचार प्रकरण में हमने आज से कुछ आवश्यक 'छिद्रान्वेषण' करने का विचार किया है उदाहरणार्थ ---आज के लिए ----
.राजस्थान पत्रिका २४-११-१०--आलेख -'बच्चों पर गुस्सा क्यों ' एक अति सुन्दर , सार्थक, लाभदायक आलेख है ,जो 'पेरेंटिंग का तरीका ' सिखाने के नायाब विचार प्रस्तुत करता है। ---यदि हम आलेख का छिदान्वेषण करें तो ---" आई लव यूं" को एक मन्त्र बताया गया है , प्यार प्रदर्शित करने का। --अर्थात वही सिर्फ प्रदर्शन को ही महत्त्व देदिया गया लेखक द्वारा जाने -अनजाने में , वह भी अंग्रेज़ी -विदेशी भाषा-भाव द्वारा---जो निश्चय ही यह गलत सन्देश पहुंचाएगा समाज-व्यक्ति-बच्चों में कि हमारी संस्कृति / हिन्दी में अच्छे भाव -शब्द आदि नहीं है और अंगेरजी के बिना कहीं अच्छी बातें नहीं हैं तथा प्रदर्शन /दिखावा महत्वपूर्ण है।
' निक नेम रखें ' सही है सदा ही बच्चों के उपनाम रखे जाते रहे हैं , अच्छी परम्परा है। परन्तु 'प्यार का नाम' क्यों नहीं कहागया वही विदेशी , अंग्रेज़ी परम्परा के प्रवाह का बढ़ावा -जाने- अनजाने
------------क्या एसे छिद्रों को हमें जानना प्रसार करना नहीं चाहिए ?
- इसी अंक में 'गुलाब कोठारी' की एक सुंदर कविता है--जो उनकी कृति 'आद्या' से है। यद्यपि सामान्य दृष्टि से देखने पर यह एक सुन्दर आध्यात्मिक कविता लगती है --
" आद्या ,/नारी नहीं हो ।/पुरुष हो तुम भी । ......इसी में छिपा है/एक अर्धनारीश्वर.... प्रकृति है वह और पुरुष भी ...कृष्ण/और माया है उसकी राधारानी..../वही स्त्रैण है सहेली तुम्हारी ..शक्ति तुम्हारी ......"
छिद्रान्वेषण करने पर पूरी कविता स्त्री -पुरुष के सुन्दर समन्वयात्मक संबंधों को परिभाषित करती है, साथ ही धुर सामान्य भौतिक/शारीरिक स्तर से लेकर कृष्ण राधा के प्रेम की रहस्यात्मक -लौकिकता से आगे उच्चतम अवस्था ब्रह्म-आत्मा के वास्तविक मिलन तक का दृश्य प्रस्तुत करती है, कि स्त्री अपने स्त्रीत्व भाव से ही सब कुछ पा सकती है,यद्यपि पुरुष -स्त्री दोनों ही भाव उसमें हैं इसमें शक नहीं ,परन्तु अपने स्वाभाविक स्त्री भाव त्यागने पर उसे क्या मिलेगा , कुछ नहीं --- जो आज के द्वंद्वात्मक युग की आवश्यकता है
--------क्या एसे सुन्दर बुनाई वाले छिद्र- तत्वों को हमें नहीं जानना चाहिए?
----हाँ , इसमें एक छिद्र यह भी है कि इतनी उच्च -साहित्यिक काव्य -सामान्य जनता के लिए समझना कठिन है , परन्तु यदि सुविज्ञ-जन भी यह समझ कर इसे सामान्य जन के लिए प्रसारित/प्रचारित करें तो समीचीन होगा। यह उनका दायित्व भी है।