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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 23 जनवरी 2011

-प्रयाण गीत ---डा श्याम गुप्त ....

नवीन राह पग धरो....२३ जनवरी नेताजी सुभाष बोस के जन्मदिवस  पर --प्रयाण गीत ---


न तुम निराश हो कि,
पूछता हमें नहीं कोई |
न तुम निराश हो कि,
सूझती न राह अब कोई ||


हर तरफ है स्वार्थ और-
दंभ की हवा चली |
कराहती मनुष्यता, औ-
आस्था गयी छली ||


मनुष्य ही मनुष्यता का,
शत्रु होरहा है अब |
सज़ा रहा स्वयं के ,
विनाश का ही साज़ सब ||


आदमी को आदमी से,
प्रीति-भाव ही नहीं|
न्याय सत की बात अब,
कोई समझ पाता नहीं ||


हाँ राजनीति आजकी,
कुटिलता नीति होगई |
हाँ रीति-नीति आज सब,
अनीति प्रीति हो गयी ||


हाँ धर्म नीति ,शास्त्र से,
विभिन्न रीति बन गयी |
औ कर्म-नीति स्वार्थ से,
अभिन्न हुई तन गयी ||


मानते हैं सत को आज 
पूछता ही कौन है |
काक गाते रागिनी,औ 
कीर-पिक मौन हैं ||


न देश राष्ट्र भक्ति की,
भावना उभर रही |
न राष्ट्र-देश हेतु ,कोई-
कामना संवर रही ||


सुख-साधनों की भीड़ में,
हम अकेले होगये|
मीत मौज मस्तियों के,
मेले कहीं खोगये ||


कवि और शायर भी कहाँ ,
अब , राष्ट्र गीत गारहे |
चारणों के वेश में ,
हैं वन्दना सुना रहे ||

हाँ आज काली रात है,
आयेगा नव प्रभात भी |
 चढ़ेगा सूर्य फिर वही,
फैलेगा नव-प्रकाश भी ||

निज शास्त्र नीति भूलकर,
अप-भाव नीति बह चले |
बैठ करके कागजों की,
नाव में हैं हम चले ||


थका नहीं प्रताप था,
जो जीतने की चाह थी |
झुका नहीं सुभाष था ,
क्या जूझने की राह  थी ||


न कोई साथ दे अगर,
जो राह में,न गम करो |
अकेले ही चले चलो,
न तुम रुको न तुम डरो ||


जो धीर हैं भला कभी,
रुकावटों से कब रुके |
है वीर,जो न दुश्मनों के,
सामने कभी झुके ||


न भटको सत्य राह से,
न छोडो राह , आस की |
वो राह चलके आयगी,
स्वयं तुम्हारे पास ही ||


तुम सपूत देश के ,
यूं कंटकों से क्यों डरो  |
नव दीप लिए हाथ में,
नवीन राह पग धरो ||