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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 30 मार्च 2011

वेदों में शब्दों के अर्थार्थ....डा श्याम गुप्त....

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
           प्रायः लोग व तथाकथित विद्वान वेदों के शब्दों का मूल अर्थ न जानते हुए अनर्थ मूलक अर्थ लगाते हुए उनमें वर्णित भावों को समझे बिना बुराई करने का प्रयत्न करते हैं , अभी हाल में यह प्रवृत्ति काफी देखी जारही है | वेद उच्चकोटि का साहित्य है अतः जिस प्रकार दर्शन व वैदिक विज्ञान, गायत्री ज्ञान के अनुसार मानव के पांच शरीर होते हैं( अन्नमय , प्रा्णमय, मनोमय,विग्यान मय व आनन्द मय )  वैसे ही वैदिक शब्दों के प्रायः  पांच अर्थ होते हैं -- यथा---  गौ शब्द का का अर्थ सिर्फ गौ नहीं अपितु....गाय , पृथ्वी, किरणें ,बुद्धि व इन्द्रियां होता है,जो  वैदिक मन्त्रों में प्रयुक्त होता है |  योनि शब्द का अर्थ सदैव स्त्री योनि लगाकर काम -मूलक अर्थ बताये जाते हैं ...योनि का अर्थ--- स्त्री जननांग, सृष्टि  का गर्भस्थल अंतरिक्ष, पृथ्वी का गर्भ स्थल समुद्र ,एवं प्रत्येक वस्तु-भाव का जन्म स्थल  या उत्पत्ति स्थल के रूप में वेदों में प्रयुक्त होता है | कुछ अन्य कुछ बताये जाने वाले  भ्रमात्मक शब्द-भावों के वेद आदि में वर्णित अर्थ इस प्रकार है---
शूद्र --- "शुचं अद्र्वति इति शूद्र |"...गीता   --- जो शोक के पीछे भागे वह शूद्र है |
          "गुणार्थमितिचेत "....मीमांसा(६/१/४८ ) ---अर्थात  योग्यता ही जाति का आधार है , अतः "अवैद्यत्वात भाव कर्मणि स्वात "( मीमांसा ६/१/३७ )--अर्थात विद्या का सामर्थ्य न होने से ही  शूद्र होता है |
तथा .."यदि वां  वेद निर्देशशाद्य शूद्राणाम प्रतीयेत " ..( मी -६/१/३३) ---शूद्र भी योग्यता प्रमाण देकर वैदिक मन्त्रों का अधिकारी हो सकता है |
लिंग -- वैशेषिक ४/१/१ के अनुसार...." तस्य कार्य लिंगम " अर्थात उस (ईश्वर या अन्य किसी ) का कार्य ( जगद रूप या कोइ भी कृत-कार्य )ही उसके  होने का लक्षण (प्रमाण ) है | अतः --लिंग का अर्थ सिर्फ पुरुष लिंग नहीं अपितु चिन्ह,प्रमाण, लक्षण व अनुमान भी है |