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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 27 मई 2011

अन्त्याक्षरी --लघु कथा ...डा श्याम गुप्त ..

                                                                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                                   "  ईशान कोण से चली हवा,
                                     निकला सूरज का गोला |
                                      छिपा चाँद और गयी रात्रि,
                                      वन में इक पांखी बोला  ||   "     ---- 
                             "यह तो कोई कविता नहीं है ! "   अन्त्याक्षरी के दौर में मैंने जब यह कवितांश सुनाया तो मकान मालिक का पुत्र सतीश बोला |  
             क्यों ? यह द्विवेदी जी द्वारा किया गया प्रात: वर्णन है | तुम्हें याद नहीं तो हम क्या करें , मैंने ने कहा |
             'ल'  पर हुआ , 'ल' पर बोलो , जल्दी; चालाकी से अधिक समय मत लो | मेरी तरफ  के  सदस्य चिल्लाए |
                           स्मृतियों का खाता खुलने लगता है |  बचपन में छत पर समय मिलते ही बच्चों  की मंडली जुड़ने पर , अन्त्याक्षरी का खेल तो एक आवश्यक पास्ट-टाइम था किशोरों का |  मोहल्ले के आसपास के बच्चों की छत पर एकत्रित होकर दो टोलियाँ बनाकर, कविता, छंद, दोहा, गीत आदि के गायन की प्रतियोगिता होती थी यह |  कड़ी शर्त यह होती थी की कविता, दोहा या कोई भी छंद-गीत आदि का कम से कम एक पूरा बंद होना चाहिए, आधा-अधूरा नहीं; जो मूलतः  रामायण या प्रसिद्द कवियों की कृतियों से होते थे |  यह वास्तव में काव्य, साहित्य द्वारा सदाचरण-संस्कृति के पुरा मौखिक ज्ञान के सहज रूप को जीवित रखने का ही एक उपक्रम था जो खेल-खेल में ही तमाम आचार-व्यवहार-सत्संग, सदाचरण  सम्प्रेषण के पाठ भी हुआ करते थे | आज की तरह फ़िल्मी गानों के टुकड़ों का भोंडा प्रदर्शन नहीं |
                         अगला पन्ना खुलता है ....सामने की छत से अचानक मीरा की आवाज आई  ," मुझे पता है , किस कवि की कविता  है | सुन्दर है |"...फिर मेरी तरफ देखकर अपनी तर्जनी उंगली चक्र-सुदर्शन की मुद्रा में उठाकर सर हिलाते हुए चुपचाप बोली , " चालाकी, इतनी सफाई से ! "... मैंने उसे आँख तरेर कर उंगली मुंह पर रखकर चुप रहने का इशारा किया |
                मीरा मेरी बहन की क्लास-फेलो थी |   मेरी कवितायें मेरे छोटे भाई-बहनों की स्कूल-पत्रिकाओं में उनके नाम से छपा करती थीं | एक बार उसके कहने पर उसके ऊपर भी तत्काल कविता बनाई थी--
                            " दरवाज़े के पार पहुंचकर , 
                                  पीछे मुड़कर मुस्काती हो |
                                       सचमुच की मीरा लगती हो, 
                                            वीणा पर जब तुम गाती हो |"    
               अतः उसे मेरे इस  काव्य व आशु-कविता हुनर का ज्ञान था |  वह सामने वाले गली के पार वाले मकान में रहती थी |  गली  इस स्थान पर अत्यंत संकरी होजाने के कारण दोनों घरों की छतों की मुंडेरें काफी समीप थीं |  घने बसे शहरों में प्रायः घरों की छतें , बालकनियाँ आदि आमने-सामने व काफी नज़दीक होती हैं  और सुबह, शाम, दोपहर महिलाओं, बच्चों, किशोर-किशोरियों, सहेलियों, दोस्तों की आर-पार बातें व चर्चाएँ खूब चलतीं हैं | साथ ही में किशोरों-युवाओं की कनखियों से नयन-वार्ताएं, संकेत व कभी कभी प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान की  भी सुविधा मिल जाती है |
             स्मृति-पत्र आगे खुलता है......अच्छा चलो ठीक है .....सामने की टोली हथियार डाल देती है | सतीश की टोली की तेज-तर्रार सदस्या सरोज 'ल' पर सुनाने लगती है---
                         " लाल देह,  लाली लसे और धर  लाल लंगूर |
                           बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि शूर |"       
शूर ...'र' पर ख़त्म हुआ...'र ' से....|   
                                   "यह तो होचुका है |  मेरी तरफ की टोली के जगदीश ने तुरंत फरमान जारी किया |".........जगदीश की स्मृति बहुत  तीव्र थी और याददास्त के मामले में वह कालोनी में अब्वल था |  सरोज के झेंप जाने पर हम सब हँसने लगे | ..... नया बोलो...नया बोलो ...या हारो.... के शोर के बीच  रमेश ने नया कवितांश सुनाया |
                               मैं सोचता हूँ आजकल भी अंग्रेज़ी का ज्ञान बढाने के लिए ..शब्द-काव्य  रूपी अन्त्याक्षरी  होती है, जिसका अभिप्राय: सिर्फ अंग्रेज़ी का तकनीकी ज्ञान बढ़ाना, शब्द-सामर्थ्य बढाने की एक्सरसाइज ही हो पाता है ; आचरण, शुचिता, आचार-व्यवहार , संस्कृति, ज्ञान का सहज सम्प्रेषण नहीं | वस्तुतः  स्व-साहित्य, स्व-भाषा-साहित्य, स्व-संस्कृति-साहित्य- इतिहास,  अपने सामाजिक व पारिवारिक उठने-बैठने के, खेलने के तौर-तरीके निश्चय ही भावी- पीढी के मन में,  सोच में, एक सांस्कृतिक व वैचारिक तारतम्यता, एक निश्चित दिशाबोध प्रदत्त मानसिक दृढ़ता एवं ज्ञान, अनुभव  व पुरा पीढी के प्रति श्रृद्धा, सम्मान, आदर का दृष्टिकोण विकसित करती है |  आजकल पाश्चात्य दिखावे की प्रतियोगी  संस्कृति के अन्धानुकरण व सुविधापूर्ण जीवन दृष्टिकोण  में यह स्व-भाव व स्वीकृति ही लुप्त होती जारही है |






       
            
              

यूं ही नहीं होजाता कोई कबीर....

                                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

           यूं ही नहीं बन जाता कोई कबीरकबीर सिर्फ़ कबीर नहीं, एक पूरा दर्शन है, एक संसार है, एक व्यवहारिक भाव है, एक गुण है जो गुणातीत  है | कबीर का अर्थ है संत, आत्मानंद , नित्यानंद में मगन -विदेह , निर्गुणी |  यूं तो कबीर बनने के लिए एक गुरु बनाना पड़ता है--- जायसी ने कहा है......'गुरु बिन जगत को निरगुन पावा' |  पर कबीर का तो कोइ गुरु नहीं था ?  पर  रामानंद को उन्होंने अपना गुरु माना , एकलव्य की भांति --यदि गुरु नहीं हो तो स्वयम को गुरु बनाना पड़ता है , "तवै तुमि एकला चलो रे " ..."अप्प दीपो भव"--स्वयं दीपक बन कर ..शास्त्र, संसार, अनुभव, इतिहास  के प्रकाश का विकिरण करना होता है | यही किया कबीर ने , और तभी वे होपाये ...कबीर....गुरु बिनु जगत को निरगुन पावा  |
            कबीर बनने के लिए ..लाठी लेकर घर फूंकना पड़ता है ......लोभ, मोह, लिप्सा का संसार छोड़ना पड़ता है , ........
"कबीरा खडा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ,
जो घर फूंके आपणा, चलै हमारे साथ |"  ......

भोग,माया-संसार-स्त्री-पुत्रादि को भी  त्यागना पड़ता है | यह ही पहला कदम  है  जैसा कबीर ने कहा---जब जागो तभी सवेरा .....
" नारी तो हम भी करी कीन्हा नांहि विचार ,
जब जाना तब परिहरी नारी बड़ा विकार ||"
              कबीर बनने के लिए राम का कुत्ता बनना पड़ता है .....  अर्थात अहं का त्याग..मैं को गलाना पड़ता है , स्वयं को ईश-प्रवाह में छोड़ देना , ज्ञान, शास्त्र, भक्ति, विश्वास, श्रृद्धा  के प्रवाह में डुबो देना पड़ता है | ईश्वर प्रणिधान .........
"कबीर  कूता राम का,   मुतिया  मेरा नांउ ,
गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित  जांऊ |"  .....और..............
.. ..........."जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहिं  | "   --परमात्मा व परमात्म गुण से एकाकार......     
                  कबीर बनने के लिए समदर्शी बनना पड़ता है .....समता भाव में जीना पड़ता है .....सूक्ष्मदर्शी होना पड़ता है |
" कंकड़ पत्थर जोड़  के मस्जिद लई चिनाय ,
ता चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय |"...... या ..
......." लौकी अड़सठ तीरथ नहाई,  कडुआ प न  तौऊ नहीं जाई "...
..एकत्व भाव अपनाना होता है .............
    "एक मूल ते सब जग उपजा कौन बड़े को मंदे |"
                   कबीर बनने के लिए...तत्वदर्शी बनना पड़ता है...  भक्त होना पड़ता है ........
"हरि मेरे पीऊ मैं हरि की बहुरिया " .............और.......तत्वदर्शन..........

"झीनी झीनी बीनी रे चदरिया ...एक तत्व गुण तीनी रे चदरिया "      .....    
सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढ़ की मैली कीन्ही चदरिया  ,
दास कबीर जतन से ओढी, ज्यों की त्यों धर दीनी रे चदरिया |"          .
...और.....
"साधू एसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ,
         सार सार को गहि रहे थोथा देय उडाय |"  .......तथा......

" ज्यों तिल माहीं तेल है ज्यों चकमक में आग,
तेरा साईं तुज्झ में  जाग सके तो जाग |"  .......
          कबीर बनने के लिए....निर्गुणी होना पड़ता है ...... ..... " अवगुण मेरे रामजी बकस गरीब निवाज "....अपने मूल को पहचानना पड़ता  है....आत्म साक्षात्कार ...........
 "जल में कुम्भ , कुम्भ में जल है,  बाहर भीतर पानी ,
.फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कथ्यो गियानी " ......स्वयं के मूल में स्थित होना होता है....

." काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी , तेरे ही नाल सरोवर पानी "......  और यहीं... आत्म .."एकोहम बहुस्याम"... का भाव अनुभव करता है , ..."अणो अणीयान, महतो महीयान "...हो जाता है ....तथा मूल ब्रह्मसूत्र ---"अहं ब्रह्मास्मि "..."सोहं"... "तत्वमसि "...एवं .."खं ब्रह्म"...को जान पाता है.....और  होजाता है कबीर.... जान पाता है उस ब्रह्म को जिसके बारे में ........
   ..." एको सद विप्रा: बहुधा वदंति ".....