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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा ...डाक्टर्स डे पर विशेष .....( डा श्याम गुप्त )

     

चित्र-१--प्राचीन भारतीय शल्य-यंत्र ....                                         चित्र-२-शल्यक महर्षि सुश्रुत ..



      प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली अपने समय में अपने समयानुसार अति उन्नत अवस्था में थी। भारतीय चिकित्सा के मूलतः तीन अनुशासन थे
१.      1-काय चिकित्सा( मेडीसिन)जिसके मुख्य प्रतिपादक रिषि- चरक ,अत्रि, हारीति व अग्निवेश आदि थे।
 २.शल्य चिकित्सा-- मुख्य शल्यकथे- धन्वन्तरि, सुश्रुत, औपधेनव, पुषकलावति
 ३.स्त्री एवम बाल रोग- जिसके मुख्य रिषि कश्यप थे ।
       डा ह्रिश्च बर्ग ( जर्मनी) का कथन है—“ The whole plastic surgery in Europe had taken its new flight when these cunning devices of Indian workers became known to us. he  transplants of sensible skin flaps is also Indian method.” डा ह्वीलोट का कथन है-“ vaccination was known to a physician’ Dhanvantari”, who flourished before Hippocrates.”              
     इन से ज्ञात होती है, भारतीय चिकित्सा शास्त्र के स्वर्णिम काल की गाथा।
     
      रोगी को शल्य-परामर्श के लिये उचित प्रकार से भेजा जाता था। एसे रोगियों से कायचिकित्सक कहा करते थे—“ अत्र धन्वंतरिनाम अधिकारस्य क्रियाविधि “---अब शल्य चिकित्सक इस रोगी को अपने क्रियाविधि में ले ।
     सुश्रुत के समय प्रयोग होने वाली शल्य क्रिया विधियां------
१. ---आहार्य-- ठोस वस्तुओंको शरीर से निकालना( Extraction-foreign bodies).
२. ---भेद्य काटकर निकालना ( Excising).
३. ----छेद्य चीरना ( incising)
४. ---एश्यशलाका डालना आदि ( Probing )
५. ----लेख्यस्कार, टेटू आदि बनाना ( Scarifying )
६. ---सिव्यसिलाई आदि करना (suturing)
७. ---वेध्यछेदना आदि (puncturing etc)
८. ---विस्रवनिया---जलीय अप-पदार्थों को निकालना( Tapping body fluids)
-------शल्य क्रिया पूर्व कर्म ( प्री-आपरेटिव क्रिया )--- रात्रि को हलका खाना, पेट, मुख, मलद्वार की सफाई  ईश-प्रार्थना, सुगन्धित पौधे, बत्तियां नीम, कपूर. लोबान आदि जलाना ताकि कीटाणु की रोकथाम हो।
---शल्योपरान्त कर्म (पोस्ट आप्रेटिव क्रिया )रोगी को छोडने से पूर्व ईश-प्रार्थना, पुल्टिस लगाकर घाव को पट्टी करना, प्रतिदिन नियमित रूप से पट्टी बदलना जब तक घाव भर न जाय, अधिक दर्द होने पर गुनुगुने घी में भीगा कपडा घाव पर रखा जाता था।
--- सुश्रुत के समय प्रयुक्त शल्य-क्रिया के यन्त्र व शस्त्र—(Instuments & Equppements)-
कुल १२५ औज़ारों का सुश्रुत ने वर्णन किया है---( देखिये चित्र-१,,, )
 (अ)यन्त्र—( अप्लायन्स)१०५स्वास्तिक(फ़ोर्सेप्स)-२४ प्रकार; सन्डसीज़( टोन्ग्स)-दो प्रकार; ताल यंत्र ( एकस्ट्रेक्सन फ़ोर्सेप्स)-दो प्रकार; नाडी यन्त्र-( केथेटर आदि)-२० प्रकार; शलाक्य(बूझी आदि)-३० प्रकार ; उपयन्त्र मरहम पट्टी आदि का सामान;--कुल १०४ यन्त्र; १०५ वां यन्त्र शल्यक का हाथ
 (ब)शस्त्र-( इन्सट्रूमेन्ट्स)२०चित्रानुसार.
इन्स्ट्रूमेन्ट्स सभी परिष्क्रत लोह ( स्टील ) के बने होते थे।, किनारे तेज, धार-युक्त होते थे, वे लकड़ी के  बक्से में, अलग-अलग भाग बनाकर सुरक्षित रखे जाते थे ।
 अनुशस्त्र—( सब्स्टीच्यूड शस्त्र)बम्बू, क्रस्टल ग्लास, कोटरी, नेल, हेयर, उन्गली आदि भी घाव खोलने में प्रयुक्त करते थे ।
-- निश्चेतना ( एनास्थीसिया)बेहोशी के लिये सम्मोहिनी नामक औषधियां व बेहोशी दूर करने के लिए संजीवनी नामक औषधियां प्रयोग की जाती थीं ।