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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

श्याम दोहा एकादश .....डा श्याम गुप्त....

                                                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

क्यों घबराये होरही , भ्रष्टाचार की जांच |
भ्रष्टाचारी बन्धु सब, तुझे न आये आंच |1

मेल परस्पर घटि गयो, वाणिज मन हरषाय |
मेल-मिलाप करायं हम, पानी -दूध मिलाय |2

ज्ञान हेतु अब ना पढ़ें , पढ़ें नौकरी हेतु  |
लक्ष्य चाकरी होगया, लक्ष्मी बनी है सेतु |3

धन साधन की रेल में,भीड़ खचाखच जाय |
धक्का -मुक्की धन करै, ज्ञान नहीं चढ़ पाय |4

चाहे पद-पूजन करो, या साष्टांग प्रणाम |
काम तभी बन पायगा, चढे चढ़ावा दाम |5

जन तो तंत्र में फंस गया,तंत्र हुआ परतंत्र |
चोर- लुटेरे  लूटते, घूमें  बने  स्वतंत्र | 6

राजनीति की नीति में,कैसा अनुपम खेल |
ऊपर से दल विरोधी, अन्दर अन्दर मेल | 7

आरक्षण  की  आड़ में,   खुद का रक्षण होय |
नालायक सुत-पौत्र सब, यहि विधि लायक होय | 8

बाढ़  आय सूखा पड़े ,   हो खूनी संघर्ष |
इक दूजे को दोष दे , नेताजी मन हर्ष | 9

भाँति  भाँति  के रूप धरि,  खड़े मचाएं शोर |
किसको जन अच्छा कहे, किसे कहें हम चोर | १०

नेता   वाणी से   करें,  परहित  पर उपकार |
निजी स्वार्थ में होरहा, जन धन का व्यवहार || 11