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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 6 अगस्त 2011

क्या भीष्म पितामह की स्थिति यह नहीं रही होगी....ड़ा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

प्रतिदिन समाचार पत्रों में हिंसा , द्वेष -द्वंद्व , मारधाड, वलात्कार , लूट, छेड़-छाड , आर्थिक अपराध, अनैतिकता का नंगा नाच ; हर जगह घोटाले, चिकित्सा विद्यालयों में डोनेशन पर डाक्टर बनाने की मुहिम ,दवाओं की खरीद में भ्रष्टाचार , राजनीतिक स्तर पर संसद में नोट -प्रकरण, जन-हितकारी प्रश्न पूछने के लिए पैसा , सरकारों को बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त , जेलों में मर्डर, खेलों में अपराध-भ्रष्टाचार ---न कहीं किसी को सजा मिलाती है न वहिष्कार ...अपितु शान से जेलों के सोफों पर मौज करके फिर बाहर...या जेल से ही संसद में बैठने की अपील..चुनाव लडने का मौक़ा......और उस पर तुर्रा यह कि मीडिया व देश भर नाच नाच , डांस डांस में , क्रिकेट में, लोगों को करोडपति बनाने में ...कोका कोला पीने में ...मुन्नी-मुन्नी खेलने -दिखाने में लगा हुआ है ....गोया हमें क्या हम तो जो होरहा है दिखा रहे हैं......जो सब कर रहे हैं हम भी कर रहे हैं ...हम ही रह गए हैं क्या गांधीजी के पुजारी ...आदि आदि.....|
यह सब देखकर निराश -हताश जन सामान्य क्या करे...कुछ भी करने को मन ही नहीं करता , लगता है कविता-काव्य , आलेख, साहित्य-सांस्कृतिक कृतित्व ,जन आंदोलन, तर्क-वितर्क व्यर्थ ही है ...यहाँ तक कि विज्ञ, विद्वान,( जो चालू नहीं हैं ) ईमानदार , सत्यनिष्ठ जन, बुज़ुर्ग लोगों को भी कुछ करने का मन नहीं करता ...एक नितांत असहाय -मजबूरी की , किंकर्तव्य-विमूढ़ जैसी स्थिति है समाज-देश -दुनिया में .......मानव मन में .....|

" कोई बात नहीं चुभती है अबतो मन में |
कितने अनमन हैं आलस्य भरा है मन में ||"

क्या वास्तव में यही स्थिति नहीं रही होगी भीष्म-पितामह की द्वापर में--दुर्योधन -संस्कृति में ॥जिसका कोई तोड़ उनके पास नहीं था......यही स्थिति नहीं रही होगी ऋषि-मुनियों-देवों की --रावण-संस्कृति में .......... कौन बनेगा हनुमान व राम और पार्थ व कृष्ण .....???????