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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष.....अंक ९ का शेष-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

          


 

                      
                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास...पिछले अंक  से क्रमश:......                                                 अन्क नौ  का शेष

                         'पर साहित्यकार भी आज कहाँ अपना दायित्व निभा रहे हैं ।  सुरा सुन्दरी, कार, बंगलों के लिए अंधी दौड़ में शामिल होकर, सोफों पर बैठकर प्रेमगीत,गरीबी, पतन,रोंने-गाने के, सरकार व समाज विरोधी कथानक व गीत सिर्फ लिखकर बिना किसी समाधान प्रस्तुति के...वे क्या कहना चाहते हैं?   व्यर्थ के व्यंग्य, द्विअर्थी हास्य, क्लिष्ट भाषा, पान्डित्य-प्रदर्शक कवितायें, पुराने घिसे-पिटे गुरुडम, अखाड़े बाज़ी, गली गली में खुलती साहित्यिक संस्थाएं, जोड़ तोड़ कर डिक्शनरी रखकर लिखने वाले कवि, टुट पूंजियों से लेकर बड़े बड़े समाचार पत्र-पत्रिकाएं व प्रकाशक सिर्फ कमाई का ज़रिया ढूँढने में लगे हैं। साहित्य --अर्थात समाज व स्वयं साहित्य का व्यापक हित कौन सोच रहा है?  सूर तुलसी कबीर जैसा उपयोगी, व्यवहारिक साहित्य कौन रच रहा है। क्या प्रकाशकों को, बुक सेलरों को, मुद्रकों को अधिकार है कि वे तय करें साहित्य क्या व कैसा हो ।  भाषा व साहित्य कैसा हो।  क्या व कौन छपना चाहिए ?'  मैंने पूछा ।
                         नहीं, सुमि कहने लगी ,' उन्हें बस छापना, प्रकाशन व बेचना चाहिए, उन्हें  सही, शुचि सत्साहित्य के प्रकाशन के उन्नयन पर ध्यान देना चाहिए । साहित्य की दिशा व गुणवत्ता पर विश्व-विद्यालय के सम्वद्ध शिक्षकों, विद्वानों व विज्ञ- साहित्यकारों का मंतव्य ही मान्य होना चाहिये, जहां आर्थिक दृष्टि भाव न हो ।
                           आज समाचार पत्रों के संवाददाता, पत्रकार, सम्पादक, मालिक, प्रकाशक, पुस्तक-विक्रेता आदि साहित्य के दिशावोधक बन गए हैं जो मूलतः शासन-प्रशासन की अज्ञानता, अनुभवहीनता, उदासीनता व अक्षमता से होता है । आर्थिक दृष्टि के साथ गुणवत्ता का भाव रखना दुष्कर है । प्रकाशक क्या छाप रहे हैं, कैसा व क्यों छाप रहे हैं उस पर विज्ञ-समिति का नियंत्रण व समय समय पर विचार विमर्श होना चाहिए ।
                          ' और यदि विज्ञ समिति भ्रष्टाचार में लिप्त होजाय तो ।'
                         ' सही है, यह होता है, हो सकता है ।' सुमि बोली,' परन्तु गुणवत्ता की मात्रा तो अधिक रहेगी। पूर्णता के लिए तो फिर घूमकर हम वहीं पहुंचते हैं। मानव मात्र को ही सच्चरित्र होना पडेगा, तभी सब कुछ ठीक होगा । "सौ बातों की एक बात "  हज़ार प्रश्नों का एक उत्तर ।'
                            और यह कैसे होगा ? मैंने पुनः पूछा ।
                             आत्मानुशासन से, अन्य चाहे कुछ भी करते हों परन्तु हम असत्याचरण नहीं करेंगे.....की भावना से । हाँ, यह दुष्कर कार्य है पर असंभव नहीं । हम प्रारम्भ तो करें ....कहीं से भी....सभी अपने -अपने क्षेत्र में ....घर से...सत्साहित्य से.....जैसे तुम....वह हंसते -हंसते कहती गयी ।'
                 ” क्या सोच रहे हो?
                   ’आँ.....s  s.. मुझे तुम्हारा कालिज का पहला दिन व भाषण अचानक याद आ गया ।
                   ’अब छोडो भी मत याद  दिलाओ ।’
                  ”चलो कुछ और बात की जाय”
                   हाँ, तुम्ही छेड़ो, सुमि बोली ।’
                   ’अच्छा बताओ, आज बहु प्रचारित मनुवादी व्यवस्था पर तुम्हारे क्या विचार हैं”
                                          'आधारभूत रूप में सवर्ण और अवर्ण का अर्थ मैं यह लगाती हूँ कि वर्ण का अर्थ होता है 'रंग' . अर्थात विविधता । अतः जिसके व्यवहार में , बोलचाल-कार्य में रंग अर्थात वैविध्य  है , गत्यात्मकता है, प्रगति है, युक्ति-युक्तता है..वह समाज 'सवर्ण' तथा जिसमें रंग नहीं हैं अर्थात व्यवहार-विविधता, यथायोग्य निर्णायकता नहीं, गति नहीं वरन एकरूपता , जड़ता, जड़ पशुओं जैसी समूह-प्रकृति व सोच है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता व वैविध्य चिंतन नहीं वह 'अवर्ण' है ।  अज समस्या यह नहीं कि मनुवादी सवर्ण एनी पर राज कर रहे हैं अपितु आज राजनैतिक दल व शासन मनुवादी सवर्ण व्यवस्था भूल चले है और सभी समूहवादी, जड़वादी अवर्ण व्यवस्था के पोषक हैं । यहाँ जाति व धर्म का अधिक अर्थ व महत्त्व नहीं है।
                      मैं उसे एकटक देखता रहा तो सुमित्रा बोली ,' इसे क्या देख रहे हो, क्या ये विचित्र व्याख्या है?'
                     ' हाँ, सो तो है ही, नवीन व्याख्या है ।'
                      'पर मुझे विश्वास है कि तुम इसपर पहले ही सोच चुके हो । '
                       'सच '
                       'क्या मैं गलत हूँ ?'
                        नहीं, मैं तुमसे सहमत हूँ । अच्छा मैडम! ये किटी- पार्टी  के बारे में भी स्पष्ट करें ।' मैंने बात को आगे बढाया ।
                       किटी-पार्टी विदेशी.......अरे! कहीं तुम अपने कथा-उपन्यास आदि की सामग्री तो एकत्र नहीं कर रहे हो ।' उसने अचानक आँखों में झाँक कर पूछा । मैं मुस्कुराया तो कहने लगी , चलो बताये देती हूँ, क्या याद करोगे । क्या पता मेरी ये बातें ही तुम्हारे उपन्यास, काव्य आदि साहित्य में आकर अमर होजायं और मैं भी । फिर कल मिलें न मिलें ।क्या पता ।'
                         किटी पार्टी भी तमाम अन्य रीतियों की भाँती विदेशी नक़ल है। भी पहले भी अपने यहाँ स्त्रियाँ खाली समय में आपस में उठती बैठती थीं ।  एक दूसरे के घर जाना व गीत, संगीत, नृत्य, नाटिका, वादन, चित्रकला, कढाई-सिलाई-बुनाई , कला-कौशल, हंसने-बोलने में समय व्यतीत करती थीं।आपस में सहयोग भी समाज सेवा भी ।इन कला-कौशलों का व्यवसायीकरण होजाने के बाद यही सादी-गहनों की चर्चा में परिवर्तित होगया\ परन्तु लें-दें से कोइ अभिप्राय: नहीं था। क्योंकि आजकल हर कार्य पैसों से एवं धन एकत्र करके किया जाने लगा है वही 'किटी ' है । जो धन के दिखावा व नंबर दो के कला पैसा के खर्च का जरिया बन गया है और मनोरंजन सिर्फ नाम को उसका सह-जरिया ।'

                                             -----अंक नौ क्रमश:  ...अगली पोस्ट में....        

                        

                                    

                           

रस-निष्पत्ति, श्रृंगार , बोल्ड विषय , साहित्य व श्रृंगार पर मर्यादित साहित्य कैसे लिखें....डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                  ( अभी हाल में ही ब्लॉग पर एक ब्लोगर द्वारा बोल्ड विषय पर बोल्ड कविता पोस्ट करने एवं उसको और अधिक बोल्ड शीर्षक देकर एक अन्य ब्लोगर द्वारा उसे हवा देने के कारण आयी हुई टिप्पणियों -प्रति-टिप्पणियों के कारण  काफी हलचल रही।  तमाम ब्लोगरों द्वारा विभिन्न पोस्ट, अंग्रेज़ी साहित्य पर शोध  व पुरुष मानसिकता पर व्याख्यान प्रस्तुत किये गए। प् रस्तुत हैं  श्रृंगार, बोल्डनेस व साहित्य पर कुछ विचार । )
                     मानव मन में रस-निष्पत्ति आलंबन -उद्दीपन द्वारा संचारी भावों द्वारा रस संचार से होती है जो अनुभव-विभाव द्वारा प्रदीप्त व प्रकट होती है ।  अन्य सभी रस -- यथा शांत, हास्य, वैराग्य, बीर ,रौद्र, आदि मूलतः एकाधिकारी हैं जिनमें उनकी अप्राप्ति व अत्यधिकता से अन्य रसों- भावों  की उत्पत्ति नहीं होती। श्रृंगार -रस  एक एसा रस है जिसकी अप्राप्ति ( क्रोध, रौद्र ..) प्राप्ति (शान्ति -मुमुक्षा ) व अत्यधिक प्राप्ति ( वितृष्णा,वैराग्य ) होते हैं । इसीलिये इसे रस-राज कहा गया है। स्थायीभाव प्रेम  का उत्कृष्टतम फल- रूप दर्शन अर्थात फिलोसोफी  है। श्रृंगार रस का प्रसारी, कार्यकारी व फलरूप काम है.. सेक्स है ....व संतानोत्पत्ति है  ...  जो जीवन व मानवीय सभ्यता  का उत्कृष्टतम व आवश्यकतम तत्व है। मानव का मूलतः खोजी मन अप्राप्य, आवृत, ढकी हुई , अज्ञात  के प्रति आश्चर्य, आकर्षण,व प्राप्ति-हेतु प्रयत्न व प्रगति को स्वीकारता है एवं प्राप्ति उपरांत अनाकर्षण की उत्पत्ति करता है।  प्राप्ति  व अत्यधिक प्राप्ति के बाद विकर्षण व अनाकर्षण  की उत्पत्ति होती अतः सुलभ ,सरलता से प्राप्त, अनावृत्त, खुली हुई, निरावरण के प्रति स्वाभाविक अनाकर्षण रहता है।
                       भारतीय संस्कृति में  पत्नी/ नायिका  का घूंघट,..पति/ प्रियतम के सम्मुख लज्जावरण, अंगों का आवरण मूलतः प्रेम रस के उद्दीपन व प्रदीप्तन का हेतु बनते हैं । नारी का प्रतिपल, दिवस, मॉस, वर्ष,  व वय के साथ साथ गोपनीयता,रहस्यमयता , नित-नवीनता उत्पत्ति इसी विकर्षण की... न-उत्पत्ति... का हेतु है।  इसीलिये नारी को ब्रहमा भी नहीं समझ पाता। पुरुष की नित-नवीनता युत विभिन्न रति-क्रियाओं की नवीनता भी इसी हेतु हैं ।  यह भाव सृष्टिक्रम में व्यतिक्रम उत्पत्ति हेतु प्रेम, श्रृंगार, काम  में विकर्षण व विराग का कारण नहीं बन पाता ।  यदि मानव -स्त्री-पुरुष -के समस्त अंग व भाव, विचार क्रिया -बोल्डनेस द्वारा -अनावृत व अपने सम्पूर्ण रूप-भाव में  सामने आजायं तो ..खोज समाप्ति पर यह स्थिति निश्चय ही - विकर्षण, वितृष्णा  द्वारा वैराग्य की उत्पत्ति से  सृष्टि-क्रम के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
              साहित्य भी जीवन तत्व है इसीलिये उसमें भी उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यंजना आदि द्वारा आवरित , मर्यादित, सार्थक काव्य रचना का प्रचलन है । ताकि मानव मन कल्पना के मनो-सागर में उतराता रहे ...नित-नवीन श्रृंगार रस-निष्पत्ति होती रहे ।  खुले व अनावृत बोल्ड  विषय-शब्दों- भावों द्वारा विकर्षण -अनाकर्षण  न उत्पन्न हो । सार्थक मर्यादित परन्तु रस-श्रृंगार से भरपूर अर्थ-पूर्ण साहित्य ...संस्कृत भाषा -साहित्य में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है..कालिदास के  कुमार संभव में सम्पूर्णता से रचित है।
                           मेरे  महाकाव्य " प्रेम काव्य"  की एक रस श्रृंगार से सिक्त सम्पूर्ण वर्णन सहित परन्तु मर्यादित भाषा  पूर्ण एक रचना प्रस्तुत है....देखिये ---




        सखि कैसे !


सखि री ! तेरी कटि छीन,
पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसुकाइ, हिये, 
उर भार तिहारो धरतीं हैं जैसे |


भोंहें बनाई कमान भला,
 हैं तीर कहाँ पै,निशाना हो कैसे ?
नैनन  के  तूरीण में बाण,  
धरे उर,पैनी कटार   के जैसे   |


कौन यहाँ मृग-बाघ धरे, 
कहो बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति  पिया,
जब मारै कुलांच,शिकार हो जैसे |


प्रीति तेरी  मनमीत प्रिया, 
उलझाए ये मन उलझी लट,जैसे |
लट सुलझाय तौ तुम ही गए,
प्रिय मन उलझाय गए कहो कैसे ?


ओठ तेरे विम्बाफल भांति, 
किये रचि लाल, अंगार के जैसे ?
नैन तेरे प्रिय प्रेमी चकोर,
 रखें मन जोरि अंगार से जैसे |



प्रीति भरे रस-बैन तेरे, कहो ,
 कोकिल कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की बंसी तेरे उर की, 
पिय देती सुनाई मेरे उर में से |


 अनहद नाद को गीत बजै,
संगीत प्रिया अंगडाई लिए  से   |
कंचन काया के ताल-मृदंग पै, 
थाप तिहारी कलाई दिए ते |


पंकज नाल सी बाहें प्रिया, 
उर बीच धरे  क्यों, अँखियाँ मीचे ?
मत्त-मतंग  की नाल सी बाहें, 
भरें उर बीच रखें मन सींचे ||