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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 4 मई 2012

विश्व-विद्यालयीय शिक्षा कैसी हो......डा श्याम गुप्त..

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
आज के युग-द्वन्द्व के कारण का निवारण---कुछ समाधानात्मक 


विचार ..

         विश्व-विद्यालयीय शिक्षा..कैसी हो………..एक कुलपति की व्याख्यात्मक प्रस्तुति व एक नौकरशाह के……. तत्सम्बंधी….विचार….. ऊपर चित्र पर क्लिक करें.....

कुछ विचारणीय विचार बिन्दु……

१—बिना दार्शनिक सोच विकसित किये क्या कोई व्यक्ति अच्छा सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकता है ।

२- दर्शन, इतिहास एवम साहित्य का कम से कम एक वर्ष का अध्ययन किसी भी प्रोफ़ेशनल डिग्री प्राप्त करने के लिये आवश्यक होना चाहिये। 
                        ----------चित्र में दिये इसी आलेख से……                                                                            
 ३- आज चारों ओर सभी वर्गों में अन्तर्द्वन्द्व व असन्तुष्टि का यही तो कारण है कि उत्तम साहित्य के पठन-पाठन का मार्ग अवरुद्ध होगया है।साहित्य ही धर्म, इतिहास, सन्स्क्रिति आ प्रतिपादन करता है। इसी ग्यान के न होने से आज का युवा व प्रौढ वर्ग् सामाजिक-मानवीय ग्यान से अछूता रहता है, केवल प्रोफ़ेशनल-कार्यात्मक ग्यान व दैनिक व्यवहारिक ग्यान को ही ग्यन मानकर सब्कुछ जानने का भ्रम पाले रहता है व जीवन का मूल उद्देश्य व दिशा न पाकर विभिन्न अन्तर्द्वन्द्वों में घिरा रहता है य पलायन वादी..अति-भौतिकतावादी बन जाता है।
                     -----------डा श्याम गुप्त के इन्द्रधनुष उपन्यास से…

४- भूल हमारी ही है शायद केजी !….उन्नतिे, विकास, भौतिकता की चकाचौंध व शीघ्रातिशीघ्र फ़ल प्राप्ति की  दौड में एवं अन्धाधुन्ध पाश्चात्य नकल करके बराबरी की होड में सदियों की दासता से अपना गौरव, सन्स्क्रिति, इतिहास  भूले हुए हम लोग अपनी स्वयं की अस्मिता,भाव, भाषा, सन्स्कार, साहित्य को संभाल कर नहीं रखपाये और आने वाली पीढी के लिये अनुकरण-अनुसरन के लिये आदर्श व उदाहरण प्रस्तुत करने में असफ़ल रहे। ….….बिना इतिहास, शास्त्र…सत्साहित्य के कोई भी समाज –राष्ट्र कब उन्नत हुआ है…..। 
                         -------- इन्द्रधनुष उपन्यास में डा श्याम गुप्त…