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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 15 मई 2012

कविवर डी तन्गवेलन की हिन्दी कविता --मातृत्व की महक ... डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
          
                                      चित्तूर, आंध्रप्रदेश में जन्मे, तमिल भाषी ' बेंगलूर में कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, में कार्यरत, प्रबंध व परिक्षा मंत्री (मानद)- कविवर श्री डी तन्गवेलन ' सहृदय'  ने बनारस हिन्दू वि वि , वाराणसी से एम ए (हिन्दी ) किया| वे तमिल, तेलगू .कन्नड़, हिन्दी व अंग्रेज़ी में नाटक, निबंध  लिखते थे| आपने ८१ वर्ष की उम्र में कविता लिखना प्रारम्भ किया और अपने ८१ वें जन्म दिन पर ८१ कविताओं का संग्रह 'जीवन-शोध' प्रकाशित किया |यह काव्य-संग्रह मुझे सौभाग्य से अपने उपन्यास 'इन्द्रधनुष' के लोकार्पण समारोह पर मेरे सम्मानार्थ प्रदत्त साहित्य के साथ  प्राप्त हुआ।  जीवन के सत्य से अनुप्राणित आपकी कवितायें सामान्य भाषा व उक्तियों में सशक्त अन्योक्तियों के माध्यम से व्यंजना गुण युक्त महत्वपूर्ण  सामाजिक सन्देश प्रसारित करती हैं ।  एक कविता 'मातृत्व की महक' प्रस्तुत है| ।

गमले के खिले गुलाब ने चलते
कविवर डी तंगवेलन 'सहृदय'
चंचल पवन से भरते अठखेलियाँ ,
अपने गमले की बंदी मिटते से,
सहज कुतूहलवश प्रश्न किया|

'क्या तुझे पास की मिट्टी से
 मिलजुल कर  सदा मोद  से,
मन  बहलाने की मह्दिच्छा मधुर 
कभी न मचली अंतराल से ।'

गमले की मिट्टी ने हंसकर कहा,
'क्यों नहीं होती ! रहती हर दम 
मैं अपने इर्द-गिर्द की सखियों से 
हिले-मिले मन फूले रहती ।

अब भी है मन होता, गले मिलूँ 
मगर मैं ने अपना घर अलग
बसालिया, जो मेरा बहु प्यारा
मानों, मन इससे चिपक गया ।

मेरी थी एक अदम्य कामना
मेरा स्तन्य पीता बालक
घुटनों के बल चलें इस आँगन में ,
दिन रात की मांग, भगवान से ।

मेरे इस सपने को चरितार्थ
करने तू आया आँगन में ।
जन्म देकर तुझे, मैं धन्य हुई,
सार्थक मेरा यह जन्म हुआ ।

कहता जिसे तू बंधन, वह है
वास्तव में मेरा सौभाग्य ,
जो करता स्वर्ग का अवहेलन
है मुक्ति को दूर से सलाम ।'

सुन मातृहृदय का उमडा उद्गार
स्नेह स्निग्ध कामना मंगल ,
फूल खिला, मिला जगत को सुगंध
अनन्य अन्वय अलंकार ।।