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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 4 जुलाई 2012

परमानंद .....डा श्याम गुप्त

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


       परमानंद .....
 
सब  सुख साधन प्राप्त तुझे हैं ,
सब सुख जग के पाए |
फिर  भी तू अंतर्मन मेरे,                          
शान्ति नहीं क्यों पाए ?
 
धन  पद वैभव रूप खजाने ,
प्रेम-प्रीति परिवार सुहाने |
रीति-नीति सुख,सुखद सुजाने,
सब तो तूने पाए |

फिर भी तू अंतर्मन मेरे,
 शान्ति नहीं क्यों पाए ||

पढ़ पढ़ कर सब वेद-उपनिषद ,
विविध शास्त्र, विज्ञान-ज्ञान सब |
प्रेम-गीत, जग रीति, मधुर स्वर,
भक्ति-गीत सब गाये |

मन में कितना अहं सजाये,
इच्छाओं की गाँठ बसाए |
चाहे भक्ति-मुक्ति ही चाहे ,
चैन नहीं तू पाए |

फिर भी  तू अंतर्मन मेरे,
शान्ति  नहीं क्यों पाए ||

इच्छाओं की गाँठ कटे जब,
अहं-भाव की फांस मिटे जब |
कर्तापन का दंभ हटे जब,
मुक्ति  तभी होपाये |

परम शान्ति मिल जाए,
मन में परमानंद समाये ||