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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

क्या ये ह्यूमन ट्रेफिकिंग नहीं है .....

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                              जहां भी स्टाइल की बात होती है , पुरुषों को पूरे कपड़ों से लदा हुआ दिखाया जाता है परन्तु महिलाओं को सदैव अर्धनग्न वस्त्रों में   ...क्यों .....
क्या के बिक्री नहीं है

क्या ये भी विक्रय नहीं है
       सचिन या अन्य किसी भी महिला-पुरुष  का पैसे, ब्यापार, कमाई  आदि हेतु  प्रयोग ,विज्ञापन आदि ...क्या ह्यूमन ट्रेफिकिंग  में नहीं आता , क्या ये महिला-पुरुष स्वयं के रूप, रंग ,शरीर को बेचने का कार्य नहीं करते .....

ये अच्छी बात नहीं ..डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

         ग़ज़ल...ये अच्छी बात नहीं ..

गैर के भूल की सज़ा तुझको मिले तो कोई  बात नहीं |
भूल हो तेरी सज़ा और को हो ये  अच्छी बात नहीं |

बात की  बात है  कि  वो है या  नहीं है वह ,
खुशी में भूल जाएँ खुदा को ये अच्छी बात नहीं |

मुल्क पे कुर्बान होंगे ही कलेजे वाले कोई बात नहीं ,
भूल जाए जो  मुल्क शहीदों को ये अच्छी बात नहीं |

भूल हो गैर की या तेरी हो कोई  बात नहीं ,
सबक भूल से  न ले जो ये अच्छी बात नहीं |

क्या बुरा है,क्या है अच्छा  'श्याम क्या जाने,
याद जो न रखा जाए नेकी को ये अच्छी बात नहीं |


मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

गीत...पीर मन की....डा श्याम गुप्त....

                             

                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      पीर मन की
जान लेते   पीर मन की     तुम अगर,
तो भर निश्वांस झर-झर अश्रु झरते।
देख लेते जो  द्रगों के  अश्रु कण  तुम  ,
तो नहीं      विश्वास के  साये   बहकते
जान  जाते तुम कि तुमसे प्यार कितना,
है हमें,ओर तुम पे है एतवार  कितना  
देख लेते तुम अगर इक बार मुडकर  ,
खिल खिला उठतीं कली गुन्चे महकते।
महक उठती पवन,खिलते कमल सर में,
फ़ूल उठते सुमन करते भ्रमर गुन गुन
गीत अनहद का गगन् गुन्जार देता ,
गूंज उठती प्रकृति  में वीणा की गुन्जन
प्यार की   कोई भी   परिभाषा  नहीं है ,
मन के  भावों की कोई  भाषा नहीं है
प्रीति की भाषा नयन पहिचान लेते ,
नयन नयनों से मिले सब जान लेते
झांक लेते तुम जो इन भीगे दृगों में,
जान  जाते पीर मन की, प्यार मन का।
तो अमिट विश्वास के साये  महकते,
प्यार की निश्वांस के पन्छी चहकते  
 

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

बहुत ऊपर उठ गए हैं हम......डा श्याम गुप्त.....

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                     बहुत ऊपर उठ गए हैं हम......
           विश्व मानव समाज की जीवन-पद्धति सदैव ही मूलतः दो सामाजिक विचार-धाराओं से नियमित होती आई है -- एक धर्म-प्रधान,  दूसरी धर्म-विरोधी, जिन्हें दैवीय व आसुरी विचार धारा भी कहा जाता है | व्यवहार में ये धार्मिक या ईश्वरवादी दार्शनिक विकासवाद एवं मूलतः अनीश्वरवादी, भौतिकवादी, वैज्ञानिक-विकासवाद की धाराएं हैं|  ये विचारधारायें प्रायः अतिवाद में परिणत होकर रूढ़िवादी धार्मिक विचारधारा एवं अति-भौतिकवादी विचारधाराएँ बन जाती हैं और देव-दानव, सुर-असुर, पुरा-नवीन के युद्ध समाज में प्रत्येक स्तर पर चलते रहते हैं जो मानवता के सर्वांगीण विकास में बाधा उपस्थित करते हैं|
       भारत में वैदिक-विचारधारा की अवधारणा का तीसरा तत्व विकसित हुआ जो सिर्फ भारत में ही फला-फूला एवं भारतीय सभ्यता की विश्ववारा संस्कृति का वैशिष्ट्य बना और पुरा-काल से आज तक विश्व-समाज का नीति-निर्देशन करता आया है, जगद्गुरु की उपाधि धारण करके | यह धारा दैवीय विचारधारा का ही उन्नत व समन्वित रूप है जो दार्शनिक व वैज्ञानिक विकासवाद के समन्वय की धारा है, धर्म-अध्यात्म व भौतिकता के समन्वित व्यवहार की धारा जो व्यक्ति के कर्म, पुरुषार्थ के साथ साथ सामाजिकता के परमार्थ एवं धर्म व ईश्वर-प्रणनिधान से अभिसिंचित होती है | जिसे वैदिक साहित्य में....
      “ विद्यान्चाविद्या यस्तदावेदोभय सह,
       अविद्ययाम मृत्युं तीर्त्वा,विद्ययां अमृतंनुष्ते ||” ........(.ईशोपनिषद )

से उद्घोषित किया गया | समस्त राजनैतिक, नैतिक, सामाजिक, व्यवहारिक कृतित्व इन्हीं विचारधाराओं से प्रचालित होते हैं |    
           भारत जब विदेशी-योरोपीय दासता से स्वतंत्र हुआ तो उसके सम्मुख विश्व-पटल सहित तीन प्रमुख धाराएं थीं, तीन राजनैतिक राहें थीं चलने हेतु...
१.-----एक स्वदेशी, पुरातन भारतीय वैदिक धारा-- जो भौतिकता, यथार्थ, नव-वैज्ञानिकता एवं पुरातन शास्त्रीयता की ईश्वरीय-भाव की समन्वित प्रणाली, धर्म, ज्ञान, दर्शन के साथ-साथ भौतिक प्रगति की प्रदर्शक, उदारचेता, सर्वजन-हिताय, यथायोग्य कर्तव्य व अधिकार की समर्थक...शनैः शनैः प्रगति के ठोस पथ पर चलने वाली वैदिक सभ्यता की राह ...जिसे नव-प्रगतिवादी पुरातनपंथी राह भी कह सकते थे|
२.-----दूसरी शीघ्रातिशीघ्र फलोत्पन्न वाली तेजी से वैज्ञानिक प्रगति हेतु, अति-भौतिक उन्नति युत, धर्म-ईश्वर की अपेक्षा व्यक्तिनिष्ठ, सिर्फ कर्मनिष्ठ सभ्यता की राह जो योरोप-अमेरिका की नक़ल की संस्कृति थी | 
३.----- एक अन्य तृतीय राह थी नयी दुनिया, नए भाव-विचारों से युक्त, उंच-नीच रहित, मजदूर-श्रमिक प्रधान, समान अधिकार वाली कम्युनिस्ट विचारों की राह जो रूस की क्रान्ति-प्रतिक्रांति की उपज थी |   
           गुलामी, मैकाले की शिक्षा-नीति व पुरा-भारतीय साहित्य, शास्त्र व पुस्तकालयों के विनाश से पीड़ित, आहत-मन भारतीय, स्व-संस्कृति से ही अनजान थे|  अंग्रेज़ी व योरोप में दीक्षित पढ़े-लिखे भारतीय जो स्व-संस्कृति से अनभिग्य थे एवं विदेशों की चकाचौंध से गुमराह थे उनका कांग्रेस में वर्चस्व था| स्वयं गांधीजी भी योरोपीय सभ्यता-संस्कृति से चमत्कृत थे, योरोप में पढ़े-लिखे एवं विदेश में वकालत स्थापित करने वाले गांधीजी व्यक्तिगत अपमान के प्रतिक्रया-स्वरुप भारत लौटे, भारतीय होकर | सरदार बल्लभभाई पटेल व उनके साथी भारतीय परम्परावादी थे | गांधीजी एवं कांग्रेस ने योरोपीय विचारधारा वाले पंडित नेहरू को चुना | शीघ्र ही हमने नक़ल की संस्कृति की तत्वर भौतिक-वैज्ञानिक उन्नति की योरोपीय प्रणाली की राह के विकल्प को चुन लिया और देश तेजी से वैज्ञानिक विकासवाद की राह पर चल पडा |
       आज देश भौतिक प्रगति के चरम पर है | बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, कर्मचारियों को मोटी-मोटी पगार ऊंचे-ऊंचे बहुमंजिली भवन, केम्पस, अमेरिका-योरोप से कम नहीं हैं | बड़े-बड़े मॉल ( बहुमंजिले -मल्टी-पर्पज बाज़ार—पुराने नानबाइयों की भांति) में बिना मोल-भाव खरीदारी, ओनलाइन बिना देखे खरीदारी फिर चार-चार बार के ट्रांजेक्शन और भारतीयों को गालियाँ देकर जाहिल बताकर हम ऊंचाइयां छू रहे हैं |
          बच्चों, युवाओं व महिलाओं के रहन सहन, वस्त्र, नौकरी, व्यापार सभी में उन्नति हुई है | वे नई-नई ऊंचाइयां छू रहीं हैं | सभी अमेरिकन, अंग्रेज़ी पुस्तकें, गीत, कविता, सोंग्स पढने व गाने-समझने लगे हैं | हमारे बाज़ार, सेंसेक्स, स्टॉक-एक्सचेंज, शेयर अमेरिकी बाज़ार से निर्देशित होते हैं| उपभोग की वस्तुएं ...टीवी , कम्प्युटर,मोबाइल  सभी कुछ जैसे ही अमेरिका में ईजाद होते हैं ...सबसे बड़ा उपभोक्ता व बाज़ार भारत ही होता है | हम व हमारा देश, समाज, राष्ट्र भौतिक प्रगति व वैज्ञानिक ज्ञान में भी प्रत्येक प्रकार की ऊंचाइयां छूता जा रहा है, भले ही वह नक़ल हो परन्तु है प्रगति |
          हम व्यवहार में भी इतने ऊंचे उठ गए है कि -----   
१.      हमारे बच्चे-युवा अंग्रेज़ी, अमेरिकन, योरोपियन पुस्तकें, गीत, कविता, सोंग्स समझने-गाने लगे हैं | हिंदी या मातृभाषा नहीं जानते-पहचानते; युवा विदेशी वस्तुएं ही खरीदते हैं व उपयोग करते हैं...देशी वस्तुओं को स्तरहीन बताते हैं | पहले उनके आदर्श गांधी, सुभाष, राम, कृष्ण, रामायण, गीता, सीता, सावित्री, तानसेन हुआ करते थे; अब करीना, शाहरुख, फ़िल्में व फिल्मों के अधनंगे लोग या समलैंगिक लोग होते हैं |
२.      पहले.... हमारे यहाँ गरीब भिखारी एक पैसा मांगता था, पढ़े-लिखे लोग उसे हिकारत की नज़र से देखते थे और अपने देश को गाली देते थे |
---अब चन्दा के ज़रिये जबरदस्ती भीख माँगी जाती है, माफिया बन्दूक के जोर पर भीख ( उगाही, हफ्ता ) बसूलते हैं, नाच-गाकर खुशी-खुशी पेट भरने वाले हिज़ड़े जबरदस्ती भीख रूपी बसूली करते हुए घर, गली, गाँव, मोहल्ला, सड़क, रेल में देखे जा सकते हैं| बच्चों को अपंग बनाकर भीख  मंगवाने वाले गिरोह हैं यह भी सभी जानते हैं|
३.      पहले... छोटे-मोटे लोग ...चोर-उचक्के-उठाईगीरे राह-ठग, चोरियां करते थे...डकैत साहूकारों से धन    लूटकर जनता में बाँटते थे ....
आज-----बड़े-बड़े लोग.. अफसरों, नेताओं, मंत्रियों, पुलिसवालों, जजों, व्यापारियों, डाक्टरों, टीचरों के बेटे-बेटियाँ अपहरण, लूट, डकैती, गोलीकांडों में पकडे जा रहे हैं|
४.      पहले... छोटे-मोटे बाबूलोग, काम के बदले वक्शीश मांग लिया करते थे, कभी कभी रिश्वत भी ...परन्तु उन्हें बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता था |
---- आज ....मंत्री, नेता, चीफ-जस्टिस ,अफसर, चिकित्सक, व्यापारी, सेना के अफसर, कम्पनियां रिश्वत लेते हुए व भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं|
५.      पहले ... गली के टुच्चे-मुच्चे शोहदे, दुष्ट प्रकृति के निम्न श्रेणी के लोगों द्वारा छेड़-छाड़, अश्लील बातें, फब्तियां व कभी कभी वलात्कार जैसे कृत्यों को सुना जाता था ...
----आज.... सभी बड़े बड़े महान लोग- मंत्री, नेता, चीफ जस्टिस, ,डाक्टर,अफसर, टीचर, प्रोफ़ेसर, प्रिंसीपल, सेवा-नियोक्ता, सेवा-योजक, मीडिया-पत्रकार, साथी, मित्र, सहकर्मी, कंपनियों में ...सभी छेड़-छाड़ व बलात्कार आदि में लिप्त पाए जा रहे हैं |
  सचमुच ही आधुनिक प्रगतिशील हम, कितने ऊपर उठ गये हैं आज |

               “ हम कौन थे क्या होगये
                और क्या होंगे अभी | “

    
    
 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

'आज गे के लिए तो कल न्यूड '.के लिए चिल्लायेंगे....... डा श्याम गुप्त ....

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                     उपरोक्त चित्रों में देखिये .....क्या इनमें कोई  भी सेलेब्रिटी है ??? अधिकांश युवा -पीढी के  वे लोग हैं जो फिल्म, या उल-जुलूल ड्रामा, कला, फैशन, संगीत  वाले हैं...जिनके लिए वस्त्र-पहनने व वस्त्रहीन होने में कोई अंतर नहीं...... या फिर तथाकथित एक्टिविस्ट हैं;....जिन्होंने अभी जीवन का अर्थ  भी नहीं जाना है, वास्तविक ज्ञान से जिनका कोइ लेना-देना नहीं है  ...जो इंडिया में रहते हैं भारत में नहीं ....इंडिया  में भी बस रहते हैं पर अमेरिका, योरोप से ज्ञान व सीख लेते हैं |  जिनके लिए अमेरिकन व विदेशी ही ज्ञानी एवं आदर्श हैं| विदेशी नियम, व्यवहार यहाँ तक कोर्ट -क़ानून भी उनके लिए मिशाल की भाँति हैं| इनके लिए भारतीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी 'बारबेरिक' है( यह शब्द भी विदेशी है भारतीय शब्द कोश में कहीं नहीं है )  वे खाते भारत का हैं और गुण इंडिया के या विदेशों के गाते हैं...अथवा अधिकांश विदेशी हैं जिनके लिए नंगे होना, रहना कोई  द्विधा की बात नहीं है |  कहाँ है बड़े-बड़े.....न्यायविद ..साहित्यकार...गुरु...ज्ञानी...पंडित...राजनैतिज्ञ ..वैज्ञानिक...शास्त्रकार...दार्शनिक.....चिकित्सक ..विचारक ..आदि .....




               
IS THIS LOVE ..OR HUMAN..OR RIGHT ??????
  एसे लोग ... 'आज गे कल न्यूड '...के  लिए चिल्लाने लगें तो  कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी  | वे मनुस्मृति की बात करेंगे जैसे मनु कोई अवांछनीय व्यक्ति या संस्था हो| ये लोग खजुराहो, शिखंडी, युवनाश्व, विष्णु व कृष्ण का मोहिनी रूप, महादेव का रास-लीला हेतु बनाया गया स्त्रीवेष, कृष्ण का नारी रूप  आदि-आदि का उदाहरण खोजने व देने लगेंगे ... ....चाहे वे इन शास्त्र-पुराणों को  वास्तव में कपोल-कल्पित ही मानते होंगे | ..... वे भूल जाते हैं कि इन सबमें गे-सेक्स की कोइ बात नहीं है ..न गे-विवाह की ....अपितु सभी में रूप बदलने के तथ्य हैं | अथवा अत्यंत उच्च दार्शनिक बातें हैं | खजुराहो के भी सभी मूर्ति-कृत्य क्या व्यवहारिक जीवन में अपनाए जाते हैं ? अथवा क्या हम पुनः प्राचीन-युग में जाना चाहते हैं ?
                  लोग भूल जाते हैं कि ---
         १.इस कृत्य को कानूनी जामा पहनाने का अर्थ होगा कि हम अपने सेना, स्कूल, कालिज, केम्पों आदि संस्थाओं में जहां  समान-लिंग के अथवा  सभी व्यक्ति, बच्चे, युवा आदि समूह में रहते हैं उनमें अनुचित व गलत समाचार जाएगा और वे दुष्कृत्यों हेतु स्वतंत्र होंगे |( चुपचाप तो आज भी सबकुछ होता  है परन्तु उस गलत अप्राकृतिक  तथ्य को  सही करार देने की क्या आवश्यकता है| खुले में करने की क्या आवश्यकता है )

       २.क्या यह महिलाओं व पुरुषों के लिए बेईज्ज़ती की बात नहीं है |  महिला द्वारा महिला से सेक्स... महिला द्वारा पुरुष का, पौरुष का  अनादर है इसी  प्रकार पुरुष द्वारा स्त्रीत्व व स्त्री का भी अनादर है |

      ३.स्वयं प्रेम व सेक्स का तो यह अनादर है ही...प्रकृति का भी अनादर है अन्यथा प्रकृति क्यों स्त्री-पुरुष अलग अलग सृजित करती |

     ४. यह दुष्कृत्य मानवता व मानव-विकास का भी अनादर है ...... जीव जगत में कहीं  भी समान लिंग में सेक्स नहीं  देखा जाता ..... एक लिंगी जीव  अलिंगी-फ़रटिलाइज़शन करते हैं या अन्य लिंगी से ....अथवा वे जीव स्वयं द्विलिंगी( यथा केंचुआ आदि ) होते हैं जो आपस में निषेचन करते हैं|

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

नज़्म...तेरे जाने से...डा श्याम गुप्त....

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

            तेरे जाने से......

हम नहीं मुस्कुराए हें इक ज़माने से |
ऐसे  हालात  हुए  हैं  तेरे  जाने  से |

हंसते-रोते भी रहे यूं तो जीने के लिए ,
दर्द सारे यूंही पीते रहे पीने के लिए |
गीत जीने के भी हमने सभी गाये हैं ,
मन में खुशियों के ढेरों  सुमन उगाये हैं |

यादे उलफत को भुलाया कई बहाने से ,
ऐसे  हालात  हुए  हैं  तेरे  जाने  से |

तन में कलियाँ भी खिलीं, मस्त हवाएं भी चलीं ,
तन के आकाश में वो मस्त हवाएं छाईं |
मन के पंछी ने भी हो मस्त लगाए फेरे,
दिल की गलियों में भी वो मस्त बहारें आयीं |

हर खुशी पायी है, पायी है सभी ऊंचाई,
तुमको हर बार भुलाया है हर बहाने से |

 ऐसे  हालात  हुए  हैं  तेरे  जाने  से |
हम नहीं मुस्कुराए हें इक ज़माने से||

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

कारण कार्य व प्रभाव गीत ....कितने भाव मुखर हो उठते .....डा श्याम गुप्त ..

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                कारण कार्य व प्रभाव गीत ....कितने भाव मुखर हो उठते .....


( मेरे द्वारा सृजित, गीत की  एक नवीन -रचना-विधा  -कृति में .........जिसे मैं ....'कारण कार्य व प्रभाव गीत' कहता हूँ ....इसमें कथ्य -विशेष का विभिन्न भावों से... कारण उस पर कार्य व उसका प्रभाव वर्णित किया जाता है …. इस छः पंक्तियों के प्रत्येक पद या बंद के गीत में प्रथम दो पंक्तियों में मूल विषय-भाव के कार्य या कारण को दिया जाता है तत्पश्चात अन्य चार पंक्तियों में उसके प्रभाव का वर्णन किया जाता है | अंतिम पंक्ति प्रत्येक बंद में वही रहती है गीत की टेक की भांति | गीत के पदों या बन्दों की संख्या का कोई बंधन नहीं होता | प्रायः गीत के उसी मूल-भाव-कथ्य को विभिन्न बन्दों में पृथक-पृथक रस-निष्पत्ति द्वारा वर्णित किया जा सकता है | ).....प्रस्तुत है ...एक रचना....



   कितने भाव मुखर हो उठते .....

ज्ञान दीप जब मन में जलता,
अंतस जगमग होजाता है |
            मिट जाता अज्ञान तमस सब,
            तन-मन ज्ञान दीप्त हो जाते |
            नव-विचार युत, नव-कृतित्व के,
            कितने भाव मुखर हो उठते ||

प्रीति-भाव जब अंतस उभरे,
द्वेष-द्वंद्व सब मिट जाता है |
           मधुभावों से पूर्ण ह्रदय हो,
           जीवन मधुघट भर जाता है |
           प्रेमिल तन-मन आनंद-रस के,
           कितने भाव मुखर हो उठते ||

मदमाती यौवन बेला में,
कोई  ह्रदय लूट लेजाता |
          आशा हर्ष अजाने-भय युत,
           उर उमंग उल्लास उमड़ते |
           इन्द्रधनुष से विविध रंग के,
           कितने भाव मुखर हो उठते ||

सत्य न्याय अनुशासन महिमा,
जब जन-मन को भा जाती है |
          देश-भक्ति हो, मानव सेवा,
          युद्ध-भूमि हो, कर्म-क्षेत्र हो |
          राष्ट्र-धर्म पर मर मिटने के,
          कितने भाव मुखर हो उठते ||