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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

हम्पी-बादामी यात्रा वृत्त—९ … पत्तदकल ( पट्टाडाकल )




                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



             हम्पी-बादामी यात्रा वृत्त—९ पत्तदकल ( पट्टाडाकल )

           पत्तदकल ग्राम बादामी से २२ किमी पूर्व की ओर उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट जिला, बादामी तालुके में मालप्रभा ( मलयप्रभा) नदी के बाएं तट पर स्थित है एवं चालुक्यों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक राजधानी रहा है, यहाँ की मिट्टी व बलुआपत्थर लाल आभा लिये हुए होने के कारण इसे पट्टकिसुवोलल या रक्त-पुरा भी कहा जाता है| हम्मीर-काव्य( १५४०) एवं सिंगीराजपुराण ( १२ वीं सदी) आदि काव्य-कृतियों के अनुसार यहाँ चालुक्य सम्राटों का राज्याभिषेक होता था | इसे पट्टशिलापुर व हम्मीरपुर भी कहा गया है| दूसरी शताब्दी में आये हुए विदेशी ग्रीक यात्री टालेमी ने इसे पेट्रिगल कहा है| हम लोग प्रातःकाल नाश्ते के पश्चात् कार से ही पत्तदकल के लिए चल दिए और लगभग १० बजे पहुँच गए |


       यह वही प्राचीन पट्टशिलापुर है  जहां शिव ने अंधकासुर का वध किया था | पत्तदकल में मुख्यत: दस मंदिर स्थापित हैं जिनमें से एक मंदिर जैन धर्मशाला रूप में निर्मित है चार मंदिर दक्षिण भारतीय शैली के बने हुए हैं|  मंदिरो का विश्व-धरोहर परम्परा में स्थान है| ज्ञान शिवाचार्य जो संभवत: उत्तर भारत से आये हुए कहे जाते हैं उन्होंने उत्तर व दक्षिण भारत की संस्कृति व देवालय कला को पत्तदकल में स्थापित किया| पत्तकदल के एक अभिलेख में ज्ञानशिव  की चर्चा है जो  गंगा तट पर स्थित किसी ‘मृगथानिकाहार’ से वहां आए थे और चालुक्य महारानी त्रैलोक्य महादेवी द्वारा उनका स्वागत किया गया था। हो सकता है वह कर्नाटक आने वाले आरंभिक शैव सम्प्रदायों ..कालमुखों या पाशुपत सम्प्रदाय में से एक हों या लकुलशैव पंथ के अनुयायी रहे हों । बादामी के चालुक्यों के समय में शुरू हुआ कालमुख-पाशुपत आन्दोलन राष्ट्रकूटों  के समय में भी जारी रहा|  बौद्ध एवं जैन धर्म की सक्रियता के कारण मंद पड़ने पर भी चालुक्यों के स्वर्णिम काल में इस क्षेत्र में कालमुख और पाशुपत शैव संप्रदाय की काफी उन्नति हुई। जो मंदिरों की कला वे मूर्तियों से स्पष्ट होता है|
गज-मोक्ष -विम
         पत्तकदल मंदिर समूह विविध देवालय वास्तु-कला प्रस्तुत करते हैं जो उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय एवं इंडो-आर्यन वास्तु कला का मिश्रण है| यहाँ के मुख्य मंदिर हैं .. विरूपाक्ष मंदिर, गलगनाथ मंदिर, काड-सिद्देश्वर म., जम्बूलिंग म., मल्लिकार्जुन म.,  संगमेश्वर म., काशी विश्वेश्वर म., पापनाथ मंदिर | जैन नारायण मंदिर बादामी –पत्तदकल रोड पर स्थित है||
विरूपाक्ष म.


रावण अनुग्रह -वि.म.
 
विरूपाक्ष मंदिर ...
यहाँ का सबसे बड़ा मंदिर है | यह लोकेश्वर शिव मंदिर है | प्रवेश पर दोनों ओर द्वारपाल हैं एवं त्रिशूलधारी शिव, नंदी-मंडप में काले ग्रेनाईट की बहुत  बड़ी नंदी नंदी की मूर्ति है| भवन १८ भारी खम्भों पर है जिन पर विविध पौराणिक शिप-कालाक्रितियो एवं श्रंगारिक मूर्तियों का चित्रण है जिनमें नरसिंह, रावण-अनुग्रह, गजेन्द्र मोक्ष आदि चित्रित हैं|
नंदी मंडप -वि.म.


शिव-अंधकासुर को त्रिशूल पर टाँगे हुए व लकुलीश वि.म.
शिव गण --वि.म.पत्तदकल



















गलगनाथ मंदिर ...इसके प्रवेश द्वार पर नटराज की कलाकृति है | इसी स्थान पर शिव द्वारा अंधकासुर का वध किया गया था जिसका चित्रण मुख्य द्वार पर है| कुबेर, गज-लक्ष्मी का भी चित्रं है|| गर्भ गृह में शिव-लिंग है


कुबेर -गलग.म.
गल.म.--द्वार पर अन्धाकासुर को त्रिशूल पर टाँगे हुए शिव 
गलग नाथ मंदिर

संगमेश्वर मंदिर
खंडित शिवलिंग -संगमेश्वर म.



















संगमेश्वर मंदिर....एक बड़े आकार का सुन्दर कलाक्रितिपूर्ण मंदिर है इसमें वास्तु-शिल्प किसी कारणवश अधूरे छूटे  हुए हैं| यह यहाँ का सबसे पुराना मंदिर है






काड सिद्देह्वर मंदिर
शिव लिंग --काड-सिद्देह्वर म.
अर्धनारीश्वर -काड-सिद्दे.म.
शिव-काड.सि. म.

 काड सिद्देश्वर मंदिर....गलगनाथ म. के समीप है प्रवेश द्वार के ऊपर शिव-पार्वती का शिल्प-चित्र है | बाहरी दीवार पर शिव, हरिहर , अर्धनारीश्वर आदि के शिल्प हैं||
जम्बूलिंग मंदिर....सुन्दर कलाकृति का छोटा मन्दिर है प्रवेश के शिखर पर नंदी सहित शिव-पार्वती हैं| विष्णु व शिव की एवं वीरभद्र की मूर्तियाँ भी हैं|
शिव-लिंग -जम्बू-लिंग म.
जम्बूलिंग मंदिर







मल्लिकार्जुन मंदिर ...विरुपाक्ष म. के समीप है | स्तंभों और सभामंड़प में पुराण, महाकाव्य,गीता व पंचतंत्र की कलाकृतियाँ उकेरी गए हैं| शिव-पार्वती, लकुलीश, हरिहर ,महिषासुर मर्दिनी , नृसिंह द्वारा हिरन्यकश्यप वध एवं दो स्त्री-मूर्तियाँ एवं सामाजिक जीवन की मूर्तियाँ भी हैं|
युगल---मल्लिका.म.
दैनिकचर्या --मल्लिका..म.
नृसिंह -हिरान्याक्ष्याप -मल्लिका.म.
मल्लिकार्जुन मंदिर










काशी विश्वेश्वर म.
 काशी विश्वेश्वर मंदिर...बाहरी सजावट काले बलुआ पत्थर से है | नृत्यरत शिव एवं विविध प्रकार की अन्य कलाकृतियों का निर्माण हुआ है|
पापनाथ मंदिर

 पापनाथ मंदिर .... विरूपाक्ष म. के दक्षिण में है| विष्णु के चित्र, गज-लक्षमी आदि होने से विष्णु मंदिर रहा होगा|. रामायण व महाभारत के दृश्य उकेरे गए हैं|
चंद्रशेखर मंदिर
चन्द्र शेखर मंदिर ...संगमेश्वर म. के वायीं ओर एक छोटे से हाल में शिव-लिंग स्थापित है|
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विवाह पूर्व यौन संबंध में स्त्री विवेक के साथ पुरुष विवेक भी आवश्यक है --------- डा श्याम गुप्त .....

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



विवाह पूर्व यौन संबंध में स्त्री विवेक के साथ पुरुष विवेक भी आवश्यक है ---------  

             उच्च न्यायालय का द्वारा अभी पुरुष द्वारा शादी का झांसा देकर पर सम्बन्ध बनाने फिर शादी से मुकर जाने पर महिला द्वारा वलात्कार का मुकदमा दायर करने के एक प्रकरण में दिया गया फैसला बिलकुल सही है कि सहमति से संबंध बनाने पर इसे वलात्कार नहीं माना जायगा|  यह फैसला दूरगामी प्रभाव वाला एवं समाज के व्यापक हित तथा स्वयं यह स्त्री हित के अनुकूल ही है| आज के बदलते सामाजिक परिप्रेक्ष्य में जहां स्त्री-पुरुष की संगति के मौके अधिक हैं, शादी पूर्व यौन सम्बन्ध आवश्यक तो नहीं, जो कभी नहीं रहे, परन्तु यदि स्त्री स्वयं यौन-सम्बन्ध बनाती है तो उसका अपना दायित्व है, अतः स्त्री को अपनी स्वयं की एक सीमा रेखा बनानी होगी | ……. यदि पढी-लिखीवालिग़ लड़की अपना हर फैसला लेने में स्वतंत्र लड़की-महिला अपनी इच्छा से सम्बन्ध बनाती है तो वह उसके परिणामों से भली भांति परिचित है ..उसे या तो स्वयं पर कंट्रोल करना चाहिए अथवा परिणाम को स्पोर्टिंग-स्वस्थ-भाव से लेना चाहिए……विवाह से मुकरजाना आदि सदा से ही होता आया है जो उभयपक्षीय स्वभाव है| पौराणिक गंगा-शांतनु...उर्वशी–पुरुरवा ..आदि स्त्रियों के पुरुष को त्याग कर स्वयं ही सम्बन्ध आगे न निभाने के उदाहारण हैं, और आज भी स्त्रियाँ भी ऐसा करती हैं|
        पौराणिक संबंधों में अर्जुन-चित्रांगदा, अर्जुन-उलूपी, भीम-हिडिम्बा, कुंती-सूर्य, मेनका-विश्वामित्र, दुष्यंत-शकुन्तला जैसे स्त्रियों की त्रुटियों के तमाम उदहारण हैं परन्तु किसी भी स्त्री ने अपनी त्रुटि को पुरुष पर लादने की प्रयत्न नहीं किया, न स्वयं को कमजोर साबित होने दिया ..अपितु स्वयं को समर्थ व पुरुष की सहायता के बिना भी जीकर दिखाया एवं समय पड़ने पर अपनी संतान को पिता की सहायता हेतु प्रस्तुत करके पुरुष से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध किया |
          राधा ने कब कृष्ण से शिकायत की अपितु अपने प्रेम को बंधन न बनने देने हेतु स्वयं उन्हें कर्तव्य पथ पर चलने को प्रेरित किया जिसके फलस्वरूप कृष्ण ...श्रीकृष्ण बने एवं विश्व को गीता जैसा कर्मयोग का सिद्धांत प्राप्त हुआ| आज भी कुछ महिलायें ऐसी होती हैं|
           इसके साथ ही एक अन्य मूलभूत बिंदु पुरुष-दायित्व का भी है| यद्यपि आज की  सशक्त-शिक्षित महिला को भावनात्मक आधार पर पुरुष द्वारा भरमाये जाने का आधार व आसार कम ही हैं फिर भी शादी से पूर्व यौन संबंधों में स्त्री को पुरुष द्वारा भावनात्मक रूप से भरमाये जाने की शंका सदैव रहती है | अतः पुरुष को भी अपना सामजिक दायित्व समझना चाहिये एवं ऐसे प्रकरण से बचना चाहिए | यदि स्त्री भावुकता की कमजोरी में या त्रुटिवश या नासमझी में त्रुटि करती है तो उन्हें अपने उस पुरुष- दायित्व को समझना चाहिए जिसे वे अपना पुरुषत्व कहते हैं एवं स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं |…… आज भी ऐसे दायित्व बोध-युत पुरुष होते हैं|
           पुरुष दायित्व के पौराणिक उदाहरण लें तो विश्व का सबसे पहला उदाहरण ऋग्वेद के यम-यमी प्रकरण का है | यम-यमी सूर्य की संतान हैं| किसी एकांत स्थल में यमी, यम से सम्बन्ध बनाने का आग्रह करती है | वह काल स्त्री की स्वतन्त्रता एवं स्वेच्छा का काल था, स्त्री की इच्छा का आदर करना पुरुष का कर्तव्य माना जाता था | परन्तु यम ने विभिन्न तर्कों से यमी को इस त्रुटिपूर्ण कृत्य से विरत किया | इसीलिये यम बाद में नियमों एवं अनुशासन के देवता हुए ..जिन्हें आज भी यमानुशासन एवं नियमानुशासन कहा जाता  है |
         अन्य उदाहरणों में.... ताड़का-विश्वामित्र प्रकरण...शूर्पणखा–राम प्रकरण....अर्जुन-उत्तरा प्रकरण आदि पुरुष की दृड़ता के उदहारण हैं|