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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

शरीर में आत्मा का निवास कहाँ होता है ...ड़ा श्याम गुप्त ..

                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                   आत्मा का निवास कहाँ होता है


          ब्रह्मा से बालखिल्य मुनियों ने पूछा कि आत्मा कहां स्थित है तो वे बोले- यह आत्मा तेज, संकल्प, प्रज्ञान, अहंकार व प्रजापति आदि पांच रूपों में ह्रदय गुहा में स्थित  रहता है | सत्य संकल्पित मन, प्राण भी यही आत्मा है |

          वृहदारण्यक उपनिषद् में आत्मा को चावल या यव (जौ) के दाने के सामान सूक्ष्म , हृदय में स्थित बताया है |



     कठोपनिषद १/२० कहता है --- 
“अणो अणीयान, महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम “ ------यह लघुतम से भी लघुतम व महान से भी महान आत्मा प्राणियों के गुहा ( ह्रदय ) में स्थित रहता है |

     कठोपनिषद १/१२ में कथन है – 

“ते ददर्श गूढ्मनुप्रविष्ठं, 
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणे |”
---.--अर्थात पुराणों के गूढ़ ज्ञान रूपी गहन गुहा में प्रविष्ट करके उसे ( आत्मा को ) देखा/ जाना जा सकता है|

     यहाँ ब्रह्म व आत्मा का एकत्व प्रतिपादित करते हुए कठोपनिषद का कथन है----

कठ. २/१३ में कहा है-- तस्मात्म स्थं ये अनुपश्यन्ति धीरा ...
-----धीर लोग उसे ( ब्रह्म को )आत्म में स्थित देखते हैं |

कठोपनिषद २/१७ में कथन है---

अंगुष्ठ मात्र पुरुषोsन्तरात्मा:, 
सदा जनानां हृदये संनिविष्ठ:....
------यह अंगुष्ठ आकार का पुरुष या आत्मा सदा मनुष्य के ह्रदय में स्थित रहता है |