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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

देवी के नौ रूप अर्थात – नारी के नौ रूप-भाव --डा श्याम गुप्त ....

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

                                                           


              देवी के नौ रूप अर्थात – नारी के नौ रूप-भाव 

                            नारी को सदा ही आदि-शक्ति का रूप माना जाता है | संसार की उत्पत्ति, स्थिति, संसार चक्र की व्यवस्था, व लय .... सभी आदि-शक्ति का ही कृतित्व होता है | इसी प्रकार समस्त संसार व जीवन-जगत एवं पुरुष जीवन –नारी के ही चारों ओर परिक्रमित होता है | आदि-शक्ति या देवी के ये नौ रूप एवं नौ -दिवस ---वस्तुतः नारी के विभिन्न रूपों व कृतित्वों के प्रतीक ही हैं |

१- शैलपुत्री --- वृषभ वाहिनी –अर्थात ..
---------.नारी बल का प्रतीक है...समस्त प्राणि-जगत व मानव की शक्ति प्रदायक ....पत्नी, माँ, पुत्री, भगिनी, मित्र ...प्रत्येक रूप में नारी- संसार व पुरुष के लिए शारीरिक, मानसिक व आत्मिक बल प्रदायक होती है |

२-ब्रह्मचारिणी --–अष्टकमल आरूढा, श्वेत वस्त्र धारिणी -----
--------- अर्थात नारी विद्या रूप है ---विद्या ही शालीनता, तप, त्याग, सदाचार, संयम समयोचित वैराज्ञ प्रदान करती है, ये सभी नारी-शक्ति के मूल गुण हैं | यह ब्रह्म-ज्ञान है | नारी ही अपने विविध रूपों में मानव को, पुरुष को अष्ट-कमल रूपी विविध ज्ञान से युक्त करके उसे संसार में प्रवृत्त भी करती है-----विरत भी कर सकती है |

३-चंद्रघंटा --- मष्तिस्क पर चन्द्र का घंटा रूप –तीन नेत्र व दस भुजाएं, बाघ के सवारी --- स्वर्ण शरीर ---अर्थात तीनों लोकों दशों दिशाओं में स्थित अपनी त्रिगुणमयी माया –सत्, तम, रज से नियमित संसार चक्र द्वारा-- बलशाली होते हुए भी शान्ति का उद्घोष ----

--------नारी ही समस्त संसार में, पुरुष के मन में, जीवन में शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शांति स्थापना द्वारा –ज्ञान का तेज, आयुष्य, आरोग्य, सुख, सम्पन्नता व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है |


४-कुष्मांडा ---बाघ पर सवार व अष्ट-भुजी --- दुर्गा ..

---------अर्थात ब्रह्माण्ड, ब्रह्म-अंड की सृष्टि --- नारी ही तो सृष्टि की सृष्टा है, जनक, जननी है | मानव व संसार की रक्षा-सुरक्षा हेतु विविध प्रकार के दुर्ग बनाने में सक्षम, समस्त रोग, शोक आदि निवारक होती है |

५-स्कन्द माता--- सवारी कमल एवं सिंह दोनों ....पद्मा व सिंह वाहिनी – समस्त प्रकार का कल्याण | है | ब्रह्म रूप सनत्कुमार को गोद में लिए एवं सूक्ष् रूप में छह सिर वाली देवी भी गोद में |

---------अर्थात नारी पुरुष व संसार के कल्याण हेतु कल्याण हेतु भयानक व दुर्दम्य निर्णय व रूप भी ले सकती है | नारी समस्त जगत व पुरुष की पालक धारक माता भी है | जीवन, जगत व शरीर के षट्चक्रों-विविध क्रियाओं( षटरसों या खटरस—दुनिया के प्रपंच , व्यावहारिक कला, ज्ञान, कर्म ) की नियामक भी है |
६-कात्यायिनी ---पापियों की नाशक –ऋषियों-मुनियों की सहायक, चार भुजा, सिंह सवारी –
---------नारी का सज्जनों व ज्ञानियों के प्रति सदा ही सम्मान, प्रेम-भाव रहता है व उन्हें दुष्ट जनों, पापियों से सदा ही सहायता व संरक्षण उनकी प्राथमिकता होती है |


७-कालरात्रि --- या शुभंकरी –काला शरीर, केश फैले हुए, विकट-स्वरुप, आँखों से अग्नि, अर्धनारीश्वर शिव की तांडव-मुद्रा ... काली रूप ... सदैव शत्रु व दुष्टों की संहारक ...संसार व मानव हेतु कल्याण कारक|

-------नारी का रूप सदैव ही पुरुष व संसार हेतु कल्याणकारी, शुभ कारी ही होता है परन्तु आवश्यकता पडने पर पुरुष, पिता, पुत्र, पति, भ्राता पर आपत्ति आने पर वही – दुष्ट जनों के लिए दुर्गा रूप, काली रूप रख सकती है.. | यही शक्ति का नारी का काली रूप है |

८-महागौरी –तपस्या से गौर वर्ण प्राप्ति, श्वेत बृषभ आरूढा , श्वेत वस्त्र,डमरू-त्रिशूल धारी, अन्नपूर्णा ---
----------अर्थात नारी पुरुष के लिए त्याग, तपस्या, तप सब कर सकती है...पुरुष की, समस्त संसार की पालक-पोषक शक्ति है जिसके लिए वह मान करतीहै , मनाती है , डमरू भी बजाती है और त्रिशूल का भय भी दिखाती है | पुरुष व मानव के हर वय के, जीवन के हर स्तर पर वही तो अन्नपूर्णा है जो हर प्रकार का धन, वैभव सुख, शान्ति प्राप्ति में सहायक है |

९-सिद्धिदात्री --- कमलासन पर,सुदर्शनचक्र, गदा, कमाल,शंख धारी , सरस्वती रूप श्वेत-वर्ण, महाज्ञान सहित सौम्य भाव , मधुर स्वर | विष्णु के ही अनुरूप संसार के समस्त चक्रीय-व्यवस्थाओं की नियामक.... |
---------अर्थात नारी ही तो पुरुष के, जगत के, संसार के समस्त व्यवस्थाओं की नियामक होती है ...वही तो पुरुष को ज्ञान, कर्म व भक्ति रूपी समस्त सिद्धि-प्रसिद्धियों को प्राप्त करने में सहायक होती है, सम्पूर्ण जीवन तत्व व सम्पूर्ण सिद्धि...मोक्ष में सहायक होती है|


---------यदि हम इन नवरात्र में नारी के हर वय-रूप की उपेक्षा, उस पर अन्याय, अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध अपने सोच, विचार, समर्थन व यथासंभव कदम उठाने हेतु व प्रयत्न करने का निश्चय करें, यही देवी की सच्ची आराधना होगी |
चित्र---१.-महालक्ष्मी --एवं त्रिदेव -आदियुग  .......२.दुर्गा-नवरूप



बुधवार, 6 अप्रैल 2016

माँ चन्द्रिका देवी धाम-लखनऊ ---डा श्याम गुप्त

           
                                        
                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



    माँ चन्द्रिका देवी धाम-लखनऊ 


                    लखनऊ-नई दिल्ली नेशनल हाईवे-24-सीतापुर रोड  स्थित बख्शी का तालाब कस्बे से 11 किमी आगे सड़क पर चन्द्रिका देवी तीर्थधाम है। गोमती नदी के समीप स्थित महीसागर संगम तीर्थ के तट पर एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में माँ दुर्गा के नौ रूपों के साथ उनकी वेदियाँ चिरकाल से सुरक्षित रखी हुई हैं। जो पत्थर की  पिंडियों के रूप में स्थित हैं|

               अठारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध से यहाँ माँ चन्द्रिका देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है। अमीर हो अथवा गरीब, अगड़ा हो अथवा पिछड़ा, माँ चन्द्रिका देवी के दरबार में सभी को समान अधिकार है। मेले आदि के व्यवस्थापक कठवारा गाँव के प्रधान होते हैं। महीसागर संगम तीर्थ के पुरोहित और यज्ञशाला के आचार्य ब्राह्मण। माँ के मंदिर में पूजा-अर्चना पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान (भैरवनाथ) पर आराधना अनुसूचित जाति के पासियों द्वारा कराई जाती है। यह समभाव का एक समेकित उदाहरण है।
चन्द्रिका देवी धाम की तीन दिशाओं उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में गोमती नदी की जलधारा प्रवाहित होती है तथा पूर्व दिशा में महीसागर संगम तीर्थ स्थित है। जनश्रुति है कि महीसागर संगम तीर्थ में कभी भी जल का अभाव नहीं होता और इसका सीधा संबंध पाताल से है।

    मान्यताओं के अनुसार – मूलतः कूर्म पुराण  एवं स्कन्द पुराण में इनका वर्णन है |
-----सतयुग में दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चन्द्रमा को श्राप मुक्ति हेतु इसी महीसागर संगम तीर्थ के जल में स्नान करने के लिए चन्द्रिका देवी धाम में आना पड़ा था।
-------त्रेता युग में लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) के अधिपति लक्ष्मण-उर्मिला पुत्र चन्द्रकेतु को चन्द्रिका देवी धाम के तत्कालीन इस वन क्षेत्र में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ गोमती पार करते हुए अमावस्या की अर्धरात्रि में जब भय व्याप्त होने लगा तो उन्होंने अपनी माता द्वारा बताई गई नवदुर्गाओं का स्मरण किया और उनकी आराधना की। तब चन्द्रिका देवी की चन्द्रिका ( उजली चांदनी रात ) के आभास से उनका सारा भय दूर हो गया था।
------उन्होंने एक भव्य मंदिर की स्थापना की जो १२वी सदी में विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था |
द्वापर में महाभारतकाल में पाँचों पाण्डु पुत्र द्रोपदी के साथ अपने वनवास के समय इस तीर्थ पर आए थे। महाराजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ कराया जिसका घोड़ा चन्द्रिका देवी धाम के निकट राज्य के तत्कालीन राजा हंसध्वज द्वारा रोके जाने पर युधिष्ठिर की सेना से उन्हें युद्ध करना पड़ा, जिसमें उनका पुत्र सुरथ सम्मिलित हुआ था| महाराजा युधिष्ठिर की सेना अर्थात कटक ने यहाँ वास किया तो यह गाँव कटकवासा कहलाया। आज इसी को कठवारा कहा जाता है।
------स्कन्द पुराण के अनुसार द्वापर युग में श्री कृष्ण के परामर्श पर घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने अपार शक्ति प्राप्त हेतु माँ चन्द्रिका देवी धाम स्थित महीसागर संगम में तप किया था।
-------आज से लगभग २५० वर्ष पहले यह एक घना वन था | यहाँ के कठवारा गाँव के जमींदार को स्वप्न में चंद्रिका देवी के दर्शन हुए | उन्होंने वर्त्तमान मंदिर की स्थापना की एवं अमावस्या के दिन मेले की व्यवस्था प्रारम्भ की जो आज तक चली आरही है |

इस सिद्धपीठ धाम में बर्बरीक द्वार, सुधन्वा कुण्ड, महीसागर संगम तीर्थ के घाट आदि आज भी दर्शनीय हैं।
-------- वस्तुतः यह प्रागैतिहासिक युग की सप्तमातृकाओं का मंदिर –चंडिका देवी मंदिर है | बृक्ष के कोटर में ध्यान से देखने पर सात पिंडियाँ दिखाई देती हैं, शेष रूप नव-निर्मित हैं | ये चंडी या चंडिका ( नारसिंही ) के नाम से प्रसिद्ध आदिशक्ति अम्बिका दुर्गा ने --रक्तबीज के विरुद्ध सप्त-मातृकाओं के रूप के साथ युद्ध किया था जो वैष्णवी, कुमारी, महेश्वरी, ब्रह्माणी, वाराही, एन्द्री (महेंद्री या शची, वज्री ), चामुन्डा ( चर्चिका या काली ) हैं|
------मही सागर तीर्थ --एक पाताल तोड़ कुआँ -- आर्टीजीयन कुआं है ..जिसका आतंरिक जुड़ाव गौमती से हो सकता है ...
---------गौमती नदी स्वयं भारत की एकमात्र नदी है जो हिमालय की बजाय स्वयं एक पातालतोड कुए से उद्भूत होती है --आदि-गंगा है |
चित्र-१.चंद्रिका देवी मुख्य दर्शन ...२.बाहरी द्वार --मुख्य सीतापुर हाईवे , बक्शी का तालाब पर ...मही सागर तीर्थ में भगवान शिव ...४. मही सागर तीर्थ ...५. मंदिर का द्वार
 
 
 Drshyam Gupta's photo.



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