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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 16 मार्च 2016

ये आज पूछता है बसंत ....डा श्याम गुप्त....

           
                                         

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...     

                                  

ये आज पूछता है बसंत

ये आज पूछता है बसंत
क्यों धरा नहीं हुलसाई है |
इस वर्ष नहीं क्या मेरी वह
बासंती पाती आई है |

क्यों रूठे रूठे वन-उपवन,
क्यों सहमी सहमी हैं कलियाँ |
भंवरे क्यों गाते करूण गीत,
क्यों फाग नहीं रचती धनिया |

ये रंग वसंती फीके से ,
है होली का भी हुलास नहीं |
क्यों गलियाँ सूनी-सूनी हैं,
क्यों जन-मन में उल्लास नहीं |

मैं बोला ऐ सुनलो बसंत !
हम खेल चुके बम से होली |
हम झेल चुके हैं सीने पर,
आतंकी संगीनें गोली |

कुछ मांगें खून से भरी हुईं,
कुछ दूध की बोतल खून रंगीं |
कुछ दीप-थाल, कुछ पुष्प-गुच्छ,
भी धूल से लथपथ खून सने |

कुछ लोग हैं खूनी प्यास लिए,
घर में आतंक फैलाते हैं|
गैरों के बहकावे में आ,
अपनों का रक्त बहाते हैं |

कुछ तन मन घायल रक्त सने,
आंसू निर्दोष बहाते हैं|
अब कैसे चढ़े बसन्ती रंग,
अब कौन भला खेले होली ?

यह सुन वसंत भी शरमाया,
वासंती चेहरा लाल हुआ |
नयनों से अश्रु-बिंदु छलके,
आँखों में खून उतर आया |

हुंकार भरी और गरज उठा,
यह रक्त बहाया है किसने!
मानवता के शुचि चेहरे को,
कालिख से पुतवाया किसने |

ऐ उठो सपूतो भारत के,
बासंती रंग पुकार रहा |
मानवता की रक्षा के हित,
तुम भी करलो अभिसार नया |

जो मानवता के दुश्मन हैं,
हो नाता, रिश्ता या साथी |
जो नफ़रत की खेती करते,
वे देश-धर्म के हैं घाती |

यद्यपि अपनों से ही लड़ना,
यह सबसे कठिन परीक्षा है |
सड़ जाए अंग अगर कोई,
उसका कटना ही अच्छा है |

ऐ देश के वीर जवान उठो,
तुम कलमवीर विद्वान् उठो |
ऐ नौनिहाल तुम जाग उठो,
नेता मज़दूर किसान उठो |

होली का एसा उड़े रंग,
मन में इक एसी हो उमंग |
मिलजुलकर देश की रक्षा हित,
देदेंगे तन मन,  अंग-अंग |