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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 22 मार्च 2016

कैसे रंगे बनवारी---डा श्याम गुप्त ...

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कैसे रंगे बनवारी


सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी
कोऊ तौ न रंग चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी बैजन्तीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल लाल, श्याम, नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंशी हाथ, हाथन भरे गुलाल,
प्रेम रंग सनौ कान्ह, केस कजरारे हैं |
केसर अबीर रोली, रच्यो है विशाल भाल,
रंग रंगीलो तापै मोर-मुकुट धारे हैं ||

चाहे कोऊ रंग डारौ, चढिहै न लालजू पै,
क्यों न चढ़े रंग, लाल, राधा रंग हारौ है |
राधे कहो नील-तनु, चाहें श्यामघन सखि,
तन कौ है कारौ पर, मन कौ न कारौ है |
जन कौ दुलारौ कहौ, सखियन प्यारौ कहौ ,
तन कौ रंगीलौ कहौ, मन उजियारौ है |
एरी सखि! जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ,
श्याम रंग न्यारो चढ़े, सांवरो नियारो है ||