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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 20 मई 2016

अज़नबी आज अपने शहर में हूँ मैं---डा श्याम गुप्त

                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 

 

अज़नबी आज अपने शहर में हूँ मैं


        अपने शहर में...

अज़नबी आज अपने शहर में हूँ मैं,
वे सभी संगी साथी कहीं खोगये |
कौन पगध्वनि मुझे खींच लाई यहाँ,
हम कदम थे वो सब अज़नबी होगये |



अजनबी सा शहर, अजनबी राहें सब,
राह के सब निशाँ जाने कब खोगये |
राह चलते मुलाकातें होती जहां,
मोड़ गलियों के सब अजनबी होगये |

साथ फुटपाथ के पुष्प की क्यारियाँ,
द्रुमदलों की सुहानी वो छाया कहाँ |
दौड़ इक्के व ताँगों की सरपट न अब,
राह के सिकता कण अजनबी होगये |

भोर की शांत बेला में बहती हुई,
ठंडी मधुरिम सुगन्धित पवन अब कहाँ |
है प्रदूषित फिजां धुंआ डीज़ल से अब,
सारे जल थल हवा अजनबी होगये |

शाम होते छतों की वो रंगीनियाँ,
सिलसिले बातों के, न्यारे किस्से कहाँ |
दौड़ते लोग सडकों पर दिखते सदा,                                                                           
रिश्ते नाते सभी अजनबी होगये |

Drshyam Gupta's photo. वो यमुना का तट और बहकती हवा,
वो बहाने मुलाकातों के अब कहाँ |
चाँद की रोशनी में वो अठखेलियाँ ,
मस्तियों के वो मंज़र कहाँ खोगये |

हर तरफ धार उन्नति की है बह रही,
और प्रदूषित नदी आँख भर कह रही |
श्याम क्या ढूँढता इन किनारों पै अब ,
मेले ठेले सभी अजनबी होगये ||
Drshyam Gupta's photo.
Drshyam Gupta's photo.
Drshyam Gupta's photo.