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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न ---डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


** गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न **
------प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दि.६-१०-१६ गुरूवार को डा.श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री बिनोदकुमार सिन्हा, श्री रामप्रकाश प्रकाश, अनिल किशोर शुक्ल निडर, श्री अशोक विश्वकर्मा गुंजन, श्री कौशल किशोर, डा श्यामगुप्त व श्रीमती सुषमा गुप्ता ने काव्य पाठ किया |
-------- गोष्ठी का प्रारम्भ माँ की वन्दना से हुआ | डा श्यामगुप्त द्वारा माँ शारदे से प्रार्थना की गयी--
वीणा झंकृत हो माँ वाणी,
भाषा स्वर शुचि संवर्धित हो |
अन्धकार में घिरे मनुज का,
ह्रदय दीप ज्योतिर्मय करदो |
------ गोष्ठी के प्रथम सत्र में **महाकाव्य क्या है व उसकी विशेषताओं*** पर चर्चा की गयी | डा श्यामगुप्त ने कहा कि महाकाव्य मूलत: अपने देश की जातीय और युगीन सभ्यता-संस्कृति के वाहक होते हैं। महाकाव्य सदा ही विश्व के प्रत्येक प्राचीन देश की सभ्यता-संस्कृति की अभिव्यक्ति का प्रबल माध्यम रहे हैं। भारत के ‘रामायण’ और 'महाभारत’ तथा यूनानी कवि होमर के ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ इसके प्रमाण हैं।
--------डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने महाकाव्य के मुख्य तत्वों की व्याख्या करते हुए बताया कि आठ या इससे अधिक सर्ग या अध्याय वाली काव्यकृति जिसमें किसी धीरोद्दात नायक अर्थात किसी प्रभावशाली महापुरुष जो अत्यंत गंभीर, क्षमावान् स्थिरचरित्र, और दृढ़व्रत हो, के जीवन व चरित्र का सांगोपांग वर्णन हो, एवं श्रृंगार, शांत व वीर रस में से एक की प्रधानता व अन्य के वर्णन के साथ साथ प्रकृति वर्णन भी रहे; उसे महाकाव्य माना जाता है | प्रत्येक सर्ग की रचना एक ही छंद में की जाती है, सर्ग के अंत में आगामी कथा की सूचना होनी चाहिए। महाकाव्य की कथावस्तु एक महान उद्देश्य युत होती है और महत्तर मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है।
-------- डा श्यामगुप्त के प्रश्न उठाया कि फिर ‘रामचरितमानस’ कैसे महाकाव्य हुआ उसमें तो केवल सात काण्ड ही हैं|
------इसका उत्तर देते हुए डा सत्य ने बताया कि महाकवि तुलसी के ‘रामचरितमानस’ में मूलतः अन्य सभी गुण तो महाकाव्य के हैं ही | कुछ संस्करणों में लवकुश काण्ड की उपस्थिति है अतः आठ काण्ड की शर्त भी पूरी होजाती है | महाकाव्य के कुछ लक्षण कम होते हुए भी विद्वानों ने ‘कामायनी’ को और यहाँ तक कि मुंशी प्रेमचंद के गद्य उपन्यास गोदान को भी महाकाव्य माना है | अगीत-विधा में लिखे गए काव्यों डा श्यामगुप्त के सृष्टि, ईशत इच्छा या बिगबेंग-एक अनुत्तरित उत्तर’ एवं पं. जगतनारायण पांडे के ‘सौमित्र गुणाकर’, कुमार तरल के बुद्धकथा को भी महाकाव्य माना गया है |
----- सुषमा गुप्ता जी का कथन था कि सच ही है,| बचपन में हम लवकुश काण्ड सहित आठ काण्ड वाली राम चरित मानस ही पढ़ा करते थे एवं जानते थे | पता नहीं बाद में क्या हुआ, कैसे हुआ कि मानस केवल सात काण्ड की ही रह गयी |
डा श्यामगुप्त ने समर्थन करते हुये बताया कि अपितु बालकाण्ड से पहले भी एक पाठ/अध्याय था, शायद प्रस्तावना हो जिसमें राम-कलेवा एवं अजामिल की कथा का प्रसंग भी वर्णित था | वह सब आज हटा दिया गया है पता नहीं क्या हुआ, कैसे |
-------काव्य-पाठ का प्रारम्भ करते हुए कवि अशोक विश्वकर्मा गुंजन ने कई गीत प्रस्तुत किये, एक गीतांश है-
हमको दिल का दीवाना पसंद है, और,
किसी को दिल का नज़राना पसंद है |
------- वन विभाग में कार्यरत रहे कविवर रामप्रकाश शुक्ल’प्रकाश’ ने विविध विषयक कवितायें प्रस्तुत करते हुए, दोहे द्वारा प्रदूषण रोकने में वृक्ष की महत्ता स्पष्ट की –
बहुत प्रदूषण बढ़ रहा, रोक रहे हैं वृक्ष |
लेकर दूषित वायु को, करते रहते स्वच्छ ||
-------अनिल किशोर शुक्ल निडर ने गांधीजी पर एक रचना प्रस्तुत की –
गांधी स्वराज्य के लिए लड़े
गांधी गोरों से रहे भिड़े |
------श्री बिनोदकुमार सिन्हा ने माँ की वन्दना व अन्य कई गीत प्रस्तुत किये, बेटियों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए आजकल के बेटों पर भी कटाक्ष किया ----
न बेटा कुलभूषण, न बेटी पराया धन,
विवश नहीं, होती है सक्षम बेटी |
बेटे होते सच में महान !
बनते नहीं वृद्धाश्रम तमाम ||
--------वयोवृद्ध कवि श्री कौशल किशोर ने ‘बिगड़ी मेरी बनादे .’.माँ से विनय करते हुए, सम सामयिक विषय पाकिस्तान पर सर्जीकल स्ट्राइक की बात की---
सर्जीकल स्ट्राइक से दिया भारत ने पाक को हमले का जबाव,
मिटे धूल में पाक के, देखे कश्मीरी ख़्वाब |
-------डा श्यामगुप्त ने प्रेमगीत, अगीत, प्रयाण गीत एवं छंद रचनाएँ प्रस्तुत कीं---हरिगीतिका छंद के विधान की चर्चा करते हुए एक हरिगीतिका छंद प्रस्तुत किया --
नर की कसौटी पर रहे नारी स्वयं शुचि औ सफल |
वह कसौटी है उसी की, परिवार हो सात्विक सुफल |
होजाय जग सुन्दर सकल, यदि वह रहे कोमल सजल |
नर भी उसे दे मान, जीवन बने इक सुन्दर गज़ल ||
------श्रीमती सुषमा गुप्ता ने दो सुन्दर गीत प्रस्तुत करते हुए कहा ----
तुम कहते हो याद नहीं करना,
कोइ फ़रियाद नहीं करना |
अपनी इन प्यार की बातों का,
कोइ अनुवाद नहीं करना ||
---------डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने अपने कई प्रसिद्ध गीतों एवं अगीतों का पाठ किया | एक गीत में शासन को सीमापार के आतंकवाद पर कठोर रुख अपनाने का परामर्श व्यंजनात्मकता भाव में दिया ---
मेरे मनमोहन बजाओ नहीं बांसुरी को,
एक बार आगे बढ़ चक्र को भी गहिये |
-----डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित व पुस्तक मेले में लोकार्पित कृति*** ‘अगीत-त्रयी’*** पर भी चर्चा हुई | अगीत-त्रयी के तीनों कवियों पर डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने प्रकाश डाला|
*****अवांछित कविता****** पर भी चर्चा हुई | डा श्याम गुप्त ने किसी पत्रिका से एक काव्यांश पढ़कर सुनाया----जिसका शीर्षक था ..'क्या गारंटी है '---
'करने को तो शादी करलो,
बीबी क्वांरी ही होगी, क्या गारंटी है '.....और भी गारंटियां गिनाई गयीं थी प्राय: सभी अवांछित ही थीं |
--- सभी ने एक मत से कविता की निंदा की, सभी सहमत थे कि एसी रचनाएँ एवं इस प्रकार के वर्णन साहित्य में अवांछित व निंदनीय हैं,बचना चाहिए...... पत्रिका को भी इस प्रकार के प्रकाशन से बचना चाहिए |
----------चायपान के दौरान चर्चा में श्री विनोदकुमार सिन्हा का कथन था कि गीत तो बस गाते जाओ कुछ आसान लगता है पर मेरे विचार में अगीत लिखना कठिन है |
--------डा श्यामगुप्त ने इसमें मनोवैज्ञानिक तत्व को स्पष्ट करते हुए स्पष्ट किया कि गीति तत्व हम बचपन से भजन, कीर्तन, रामचरित मानस के सर्वजन सुलभ दोहों, चौपाइयां के घर घर में प्रयोग, एवं कबीर, रहीम के जन जन प्रचलित दोहे आदि में सुनते रहे हैं अतः तुकांत सरल व ग्राह्य प्रतीत होता है
------क्योंकि गीत ह्रदय के भावों से उत्पन्न स्वभूत होता है |
------अतुकांत कविता मस्तिष्क से रची जाती है, यह कविता का वैज्ञानिक रूप है, वैश्विक रूप है अतः कठिन लगता है,
-------अगीत दोनों के मध्य की कविता है अतः आज गद्य के युग में उसकी आवश्यकता है | विश्व भर में ‘ब्लेंक वर्स’ अर्थात अतुकांत काव्य का अधिक प्रयोग होता है | विश्व का सर्वश्रेष्ठ् व प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद भी अतुकांत काव्य में ही है |
-----कविवर श्री रामप्रकाश शुक्ल का कहना था कि अगीत का अर्थ आने वाले युग का गीत |
------डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |