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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मेरी सद्यप्रकाशित प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह---डा श्याम गुप्त ---

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



                           मेरी सद्यप्रकाशित प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह ----प्रस्तुत कृति में जीवन के विविध भाव-क्षणों में प्रेम एवं श्रृंगार के विभिन्न पक्षों का विविध रूपों में काव्य-भावों के रूप में चित्रण प्रस्तुत किया गया है -----








 

मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त -----

----------------मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ----इस कृति में ईशोपनिषद जो यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है जिसमें उपनिषदकार ने १८ मन्त्रों में , मानव आचरण व व्यवहार हेतु भारतीय, वैदिक ज्ञान एवं जीवन व्यवहार के सिद्धांतों का मूल प्रस्तुत कर दिया है, उसका सरल हिन्दी में काव्य भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है -----


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 प्रस्तुत है----
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                                    तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
 के प्रथम भाग..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||