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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 2 अगस्त 2017

मुंशी प्रेमचंद्र का आलेख-----साम्प्रदायिकता व संस्कृति--डा श्याम गुप्त.....

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


मुंशी प्रेमचंद्र का आलेख-----साम्प्रदायिकता व संस्कृति--चित्र में देखें
---- यह आलेख मुंशी जी ने १९३४ में लिखा था |
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-------मुंशी जी ने यहाँ संस्कृति , साम्प्रदायिकता --के बारे में लिखते हुए हिन्दू व मुस्लिम दोनों को एक ही पलड़े पर रखा था, दोनों के रहन सहन, व्यवहार, खान-पान एक ही से थे,वे कहते हैं कि ---तो लोग किस संस्कृति के रक्षण की बात करते हैं, संस्कृति रक्षण की बात लोगों को साम्प्रदायिकता की और लेजाने का पाखण्ड है |
--------वे कहते हैं कि संसार में हिन्दू ही एक जाति-- है जो गाय को अखाद्य व अपवित्र समझती है---- तो क्या इसके लिए हिन्दुओं कोसमस्त विश्व से धर्म संग्राम छेड़ देना चाहिए |
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एसा प्रतीत होता है कि वास्तव में मुंशीजी को विश्व की स्थितियों एवं इस्लाम धर्म व उसके अनुयाइयों की मूल व्यवहारिक व धार्मिक कट्टरता के बारे में अनुमान नहीं था, जो गलती गांधीजी ने की वही सभी गांधीवादी विचारों ने भी की, अन्यथा वे ऐसा न कहते ---यदि आज वे होते तो अपने कथन पर दुःख: प्रकट कर रहे होते ..उनकी कहानियों के रूप भी कुछ भिन्न होते ..आज यूरोप व एशिया के कुछ देशीं में गाय -वध दंडनीय अपराध है |

----जो उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों के समान संस्कृति, पहनावा, खान-पान की बात लिखी थी वह ब्रिटिश राज में दोनों के दास स्थिति में होने के कारण थी एवं अधिकाँश वे मुस्लिम हिन्दुओं से ही मुस्लिम बनाए हुए थे अतः अपना पहनावा आदि एक ही थे ...
-----स्वतन्त्रता मिलते ही स्थिति एक दम बदल गयी, पाकिस्तान के रूप में एवं मुस्लिमों का सहज आक्रामक रूप सामने आगया जो देश के विभाजन एवं उसके समय की वीभत्स घटनाओं से ज्ञात होता है एवं आज विश्व भर में फैले हुए आतंकवाद से |
---- तमाम बातें असत्य भी लिखी गयी है --यथा--हिन्दुओं द्वारा गाय को अपवित्र समझना --बिंदु ४..,,मद्रासी हिन्दू का संस्कृत न समझना --बिंदु -१..
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                संस्कृति ही मानव का व्यवहार तय करती है और वह--सुसंस्कृति या अपसंस्कृति होती है | सुसंस्कृति का रक्षण होना ही चाहिए |


 

गरीबी, भूखे को रोटी-दूध बांटना .....मंदिर व आस्थायें...डा श्याम गुप्त

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 गरीबी, भूखे को रोटी-दूध बांटना  .....मंदिर व  आस्थायें

प्रेमचंद आदि गरीबों के मसीहा एवं आजकल कवियों, लेखकों, व्यंगकारों , समाज के ठेकेदारों, नेताओं, मीडिया का प्रिय विषय है...गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिरों, भगवान, मूर्तियों आदि आस्थाओं को तोड़कर उंनके स्थान पर ---गरीबों, भूखों को देना चाहिए ..आदि आदि --
-----उनके लिए कुछ छंद प्रस्तुत हैं----
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मेरे कारण नहीं है कोई, इस जगत में भूखा प्यासा,
यदि इक दिन मैं रोटी देदूं , क्या पूरी हो सब अभिलाषा |

पोथी लिखी व गाल बजाये, युगों गरीब गरीब चिल्लाए,
जो जैसा अब भी वैसा ही, क्यों न प्रभु से नेह लगाये |

जिसका जैसा भाग्य-कर्म है, उसको वैसा देता राम,
हम-तुम दें, या लिखें प्रेमचंद, आये नहीं किसी के काम |

पाथर पूजें, दूध चढे तो, रहे आस्था मन में जान,
बिना आस्था, कैसे कहिये, दे गरीब को कोई दान |

धर्म आस्था को नहीं तोडिये, यह है ईश्वर का सम्मान,
नारायण सम्मान नहीं यदि, कैसे हो नर का, श्रीमान |



 

ग़ज़ल --ऐ दिल --डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 ग़ज़ल --ऐ दिल

है उनकी बद्दुआओं का असर है भोगना ऐ दिल,
बीच मंझधार में तू भी न मुझको छोड़ना ऐ दिल |


तू उनके गेसुओं की चमक का मानी नहीं समझा,
न समझा जुल्फ का लहरों के संग संग झूमना एदिल |

भला आवाज़ दे कोई, सुने ना कोइ गफलत में ,
न क्योंकर रूठ जाए वो ज़रा खुद सोचना ए दिल |

यूं मिलना हर जगह हर बार ही यूं ही नहीं होता,
बहाना खिलखिलाने का है पड़ता ढूंढना ए दिल |

श्याम, दिल की लगी की बात अब समझा तो क्या समझा,
न क्यों पहले ही सीखा दो औ दो को जोड़ना ए दिल |